दिल्ली की सीमाओं से किसानों ने अपने अपने घर के रुख कर लिया, मगर दीवार, होर्डिंग और बैरिकेड्स पर लिखे संदेश, किसान आंदोलन की दास्तां बयां कर रही हैं। तीनों कृषि कानूनों की वापसी के संदेश और किसानों के संघर्ष की कहानियों के मिटने में अभी कुछ वक्त लगेगा। आंदोलन स्थलों पर साफ सफाई हो रही है, मगर घर, दुकानें, फैक्ट्रियों की दीवारों पर लिखे किसानों के लंबे संघर्ष को अभी भी पढ़ा जा सकता है।
किसानों के रवाना होने के बाद सुबह से ही फल, सब्जियां सहित सभी दुकानें खुल गईं। सुबह से खरीदार भी पहुंचने लगे, मगर किसान नहीं थे। हर तरफ किसान आंदोलन से जुड़े संदेशों को पढ़ने के बाद यादें फिर ताजा होती दिखीं।
टीकरी बॉर्डर पर सुबह से ही रोजाना हजारों की संख्या में किसानों सड़क पर होते थे। मगर, उनके जाने के बाद सड़कों का नजारा बदला हुआ नजर आया। न तो शामियाना और न ही आशियाना बने हैं, सड़कों के किनारे अगर हैं भी हटाने का काम तेजी से चल रहा है।
380 दिन बाद टोल नाका भी हुआ चालू
टीकरी में सड़क पर वाहनों की आवाजाही शुरू होते ही दक्षिणी दिल्ली नगर निगम का टोल प्लाजा भी खोल दिया गया। इसके खुलते ही वाहनों का आवागमन एक साल बाद फिर शुरू हो गया है। टोल नाके पर तैनात कर्मी फिर से अपनी ड्यूटी पर नजर आए। टोल प्रबंधन को भी सड़क बंद होने से पिछले करीब डेढ़ साल से नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। पहले कोरोना काल में टोल प्लाजा से वाहनों की आवाजाही बंद रही तो आंदोलन के दौरान 380 दिनों तक टोल नाका के बंद होने का असर संचालन करने वाली कंपनी पर पड़ा है।
मेट्रो में भी ग्रीन लाइन पर कम हुई भीड़
टीकरी बॉर्डर पर किसानों का प्रदर्शन स्थल से मेट्रो स्टेशन काफी नजदीक होने की वजह से वहां भी यात्रियों की भीड़ कम हो गई है। आंदोलनकारी किसान अक्सर अपने जरूरी काम के सिलसिले में आने जाने के लिए ग्रीन लाइन पर मेट्रो का इस्तेमाल करते थे। न तो सिंघु बॉर्डर और न ही गाजीपुर बॉर्डर के इतना नजदीक कोई मेट्रो स्टेशन है। आंदोलन के दौरान कई बार मेट्रो स्टेशन भी बंद किए गए थे, मगर आंदोलन के दौरान मेट्रो का भी लोगों ने खूब इस्तेमाल किया।
आए थे गुरु नानक के दीवाने, काफी कुछ सिखा गए आंदोलन के बहाने। पिछले 380 दिनों से अपने हक की लड़ाई में एकजुट हुए किसानों का सब्र, साहस, शांतिपूर्ण विरोध का तरीका हो या जीत का जज्बा, कई बातें सीखने को मिलीं। टीकरी बॉर्डर पर अपनी दुकान पर बैठी रूबी किसानों के लौटने से मायूस हैं, क्योंकि एक साल बाद किसान दुकान के बजाय अपने घरों में हैं। एक बुजुर्ग किसान ने जब जाते हुए सिर पर हाथ रखकर कहा जब भी जरूरत हो बताना और मेरे घर पर पंजाब जरूर आना। पिता सरीखे बुजुर्ग की बातें सुनकर रूबी की आंखों से आंसू छलक पड़े। बकौल रूबी, पहली बार मुझे ऐसा लगा कि मेरा कोई अपना क्यों जा रहा है। आंदोलनकारी किसानों के चले जाने के बाद हर तरफ मायूसी का माहौल रहा।
रुबी ने बताया कि पिछले 20 वर्षों से उनकी दुकान है। रोजाना भीड़ भी रहती है, मगर किसान आंदोलन के एक साल में अलग अलग राज्यों से आए किसानों के साथ एक पिता और भाई जैसा रिश्ता बन गया। जाते हुए कई परिवारों ने उन्हें अपना पता देकर अपने घर पर पूरे परिवार के साथ आने का न्यौता भी दिया है। टीकरी बॉर्डर पर जब किसानों का आशियाना हटाया जाने लगा, उस वक्त से ही रुबी को लगने लगा कि कोई अपना जा रहा है। उन्होंने बताया कि इनसे हर दिन कुछ सीखने को मिला।
..किसानों ने किया सम्मानित, अच्छे विचार हमेशा रहेंगे साथ
रुबी ने बताया कि किसानों ने जाते हुए मंच पर बुलाकर सम्मानित किया। इसमें गुरमुखी में लिखे संदेश हैं तो गुरु नानक के फोटोग्राफ के तौर पर उनके अच्छे विचारों हमारे जीवन में हमेशा साथ रहेंगे। जब भी उन्हें रोजमर्रा की कोई जरूरी उत्पाद की जरूरत हुई, पूरा करने की कोशिश रही। खाने के लिए मिठाईयां और नमकीन के साथ रोजाना चाय के लिए सैकड़ों किसान पहुंचते थे। यही बैठकर आंदोलन की कहानी रोज सुबह शाम, रविवार से सुनने को नहीं मिली। न तो कोई माइक और न ही कोई संबोधन, एक साल बाद टीकरी बॉर्डर का माळौल एक बार फिर पुराने दिनों की तरफ लौटने की तरफ बढ़ने लगा है।
खालीपन, पहले जैसा माहौल बनने में लग सकता है दो महीने का वक्त
रुबी के पति महेश ने कहा कि उनके जाने के बाद एक खालीपन से लग रहा है। फिर से ऐसा माहौल शायद फिर न बन सके। दुकान पर ग्राहक भी फिलहाल कम हैं, मगर पहले की तरह बनने में दो महीने तक का वक्त लग सकता है। उन्होंने कहा कि इतने दिनों तक साथ रहने के बाद एक दिन में सड़क साफ हो गई। जहां किसानों के आशियाने होते थे, अब वहां ई रिक्शा और वाहनों के पहिये दौड़ने लगे हैं।
सफर हो गया आसान, तीन मिनट में 15 मिनट की तय कर सकते हैं दूरी
मेट्रो से टीकरी बॉर्डर पार करने में पहले 15 मिनट का वक्त लगता था, मगर अब तीन मिनट में इतनी दूरी तय कर सकते हैं। बॉर्डर से करीब एक किलोमीटर तक के दायरे में अब कोई भी निर्माण नहीं है। स्थानीय लोगों ने बताया कि रहने के लिए तंबू या कुछ पक्के निर्माण भी हटा दिए गए हैं। इन्हें यादगार के तौर पर अपने साथ ले गए। अगर कुछ निर्माण क्षतिग्रस्त हो गए तो उन्हें भी सड़कों से हटा दिए गए हैं। मेट्रो पिलर और आसपास की दीवारों पर किसान आंदोलन से जुड़े संदेशों को अगर न देख सकें तो इस बात का अंदाजा भी नहीं लग रहा था कि एक दिन में इतनी साफ सफाई हो सकती है। सड़कों के किनारे पुलिस के बैरिकेट्स, क्रेन और सफाई के लिए हरियाणा के निगम कर्मी हैं।