दिल्ली की लाइफलाइन मेट्रो भी 25 लाख किलोमीटर के सफर के बाद थकने लगती है। लाखों किलोमीटर के सफर में मेट्रो को कभी खरोंच लगती है तो कोच के अंदर कई बार दरारें या दूसरी खराबी भी उभरने लगती है। इससे सौंदर्य में कमी के साथ-साथ यात्रियों को सफर में मुश्किलें पेश आने लगती हैं।
मेट्रो की औसत आयु करीब 30 साल है और इस दौरान एक मेट्रो 50 लाख किलोमीटर से अधिक दूरी तय कर लेती हैं। 14-19 वर्ष की मियाद पूरी करने पर मेट्रो को दोबारा नवीनीकृत करने की जरूरत होती है। इसलिए मिड लाइफ रिफर्बिशमेंट यानि आधी उम्र पूरी करने के बाद मेट्रो के नवीनीकरण की जरूरत होती है। इसे ध्यान में रखते हुए दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (डीएमआरसी) ने इस दिशा में पहल की है।
डीएमआरसी के कार्यकारी निदेशक अनुज दयाल के मुताबिक औसतन एक मेट्रो रोजाना 400-600 किलोमीटर का सफर तय करती है। एक मेट्रो रोजाना 16-18 घंटे तक चलती है। इसका असर मेट्रो में इस्तेमाल होने वाले उकपरणों पर पड़ता है। उपकरण घिसने लगते हैं या तकनीक के साथ बदलाव की जरूरत महसूस की जाने लगती है। रिफर्बिशमेंट के तहत सभी पुराने उपकरणों और यात्रियों की सहूलियत से जुड़ी सेवाओं को बेहतर किया जाता है। रिफर्बिशमेंट के तहत फिलहाल फेज-1 की मेट्रो को दूसरी लाइनों पर चलने वाली आधुनिक मेट्रो की तर्ज पर ही तकनीक और सुविधाओं से लैस किया जाता है। इससे यात्रियों को बेहतर सुविधाएं और सुरक्षित सफर करने का मौका मिलता है।
अनुज दयाल के मुताबिक यात्रियों की सुरक्षा मेट्रो की पहली प्राथमिकता है। किसी भी सूरत में इससे समझौता नहीं किया जाता है। रिफर्बिशमेंट से जहां डीएमआरसी को करोड़ों की बचत होगी तो दूसरी तरफ कम खर्च में यात्रियों को दूसरी लाइनों पर चलने वाली आधुनिक मेट्रो जैसी ही सभी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएंगी। अगर वक्त के साथ कुछ और तकनीकी बदलाव मेट्रो में किए जाते हैं तो अगली बार रिफर्बिशमेंट में उन्हें भी शामिल किया जा सकता है।