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दिल्ली दंगा: एक ही घटना में पांच प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती, अदालत ने चार को किया रद्द

Thu, 02 Sep 2021 11:32 PM IST
सुशील कुमार कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली

सार

पुलिस ने एक ही घटना के लिए एक आरोपी के खिलाफ मार्च 2020 को हुए दंगो के सिलसिले में पांच मामले दर्ज कर लिए थे। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि एक ही संज्ञेय अपराध के लिए दूसरी प्राथमिकी और नई जांच नहीं हो सकती है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि एक ही घटना के लिए पांच अलग मामले दर्ज नहीं किए जा सकते। अदालत ने कहा कि यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय दिशानिर्देश व कानून के खिलाफ है। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ पिछले साल उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान लूटपाट और परिसर में आग लगाने के आरोप में दर्ज पांच में से चार प्राथमिकी रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि एक ही संज्ञेय अपराध के लिए पुलिस पांच प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकती है।

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पुलिस ने एक ही घटना के लिए एक आरोपी के खिलाफ मार्च 2020 को हुए दंगो के सिलसिले में पांच मामले दर्ज कर लिए थे। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने फैसले में कहा कि एक ही संज्ञेय अपराध के लिए दूसरी प्राथमिकी और नई जांच नहीं हो सकती है। अदालत ने कहा कि एक ही घटना के लिए पांच अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती है, क्योंकि यह सर्वोच्च अदालत द्वारा तय कानून के विपरीत है।

उच्च न्यायालय ने एक प्राथमिकी को बरकरार रखते हुए पिछले साल मार्च महीने में जाफराबाद पुलिस थाना में उन्हीं आरोपियों के खिलाफ दर्ज चार अन्य प्राथमिकी को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने कहा यह नहीं कहा जा सकता कि घटनाएं अलग थीं या अपराध अलग थे। उन्होंने कहा पहले कहा गया है कि संबंधित प्राथमिकी में दायर आरोप पत्रों के अवलोकन से पता चलता है कि वे कमोबेश एक जैसे हैं और आरोपी भी वही हैं। 
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हालांकि अगर आरोपी के खिलाफ कोई सामग्री मिलती है तो उसके खिलाफ प्राथमिकी में दर्ज किया जा सकता है। अदालत ने मामले में आरोपी अतीर की चार याचिकाओं पर फैसला दिया है। दिल्ली पुलिस द्वारा एक ही परिवार के विभिन्न सदस्यों की शिकायतों पर दर्ज पांच प्राथमिकी में आरोपी को अभियोजन का सामना करना पड़ रहा था। 

आरोप है कि जब पीड़ित 24 फरवरी की शाम को मौजपुर इलाके में अपने घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उनका घर आग के हवाले कर दिया गया है जिससे 7-10 लाख रुपये की संपत्ति का नुकसान हुआ। आरोपी अतीर की ओर से अधिवक्ता तारा नरूला ने दलील दी कि सभी प्राथमिकी एक ही घर से संबंधित हैं जिसे परिवार के विभिन्न सदस्यों द्वारा दायर की गई हैं और यहां तक कि दमकल की एक ही गाड़ी आग बुझाने आई थी। 

उन्होंने दलील दी कि यह प्रकरण उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत के दायरे में है कि एक अपराध के लिए एक से ज्यादा प्राथमिकी दर्ज नहीं की जा सकती है। दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि सभी शिकायतों में संपत्ति अलग थी और नुकसान को अलग लोगों ने व्यक्तिगत रूप से झेला गया है और प्रत्येक प्राथमिकी का विषय दूसरों से अलग है। 

अदालत ने कहा कि सभी पांच प्राथमिकी की सामग्री एक समान हैं और कमोबेश एक जैसे ही हैं और एक ही घटना से संबंधित हैं। अदालत ने कहा संपत्ति में फ्लोर भले ही अलग है लेकिन संपत्ति एक ही है। घटना के साइड प्लान से भी स्पष्ट है कि संपत्ति एक ही परिसर की है और उसे अलग नहीं बताया जा सकता। न ही मामले में अलग जांच की जा सकती है।

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दिल्ली दंगा: उचित जांच करने में पुलिस की विफलता लोकतंत्र के प्रहरी को ‘पीड़ा’ देगी

अदालत ने दिल्ली दंगे की जांच में लापरवाही बरतने पर दिल्ली पुलिस को एक बार फिर कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने कहा विभाजन के बाद राष्ट्रीय राजधानी में सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों को जब भविष्य में देखा जाएगा, तो उचित जांच करने में पुलिस की विफलता लोकतंत्र के प्रहरी को ‘पीड़ा’ देगा।

अदालत ने आम आदमी पार्टी के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन के भाई शाह आलम और दो अन्य को मामले में आरोपमुक्त करते हुए यह टिप्पणी की। उन पर फरवरी 2020 में दिल्ली के चांद बाग इलाके में दंगों के दौरान एक दुकान में कथित लूटपाट और तोड़फोड़ करने का आरोप था। उन पर यूएपीए के तहत आरोप लगाया गया था। वर्तमान में शाह आलम न्यायिक हिरासत में हैं। उसके खिलाफ और कई मामले हैं।

ये जांच टैक्स के पैसे की बर्बादी
कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने कहा कि यह जांच दिखावा करने वाली व बेमन से की गई है। इस तरह से यह आम जनता के टैक्स के रूप में दिए पैसे की बर्बादी है। यह जांच अदालत को दिखाने के लिए की गई है। इस मामले में आरोपियों के घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर कोई सीसीटीवी फुटेज नहीं है।

अदालत ने कहा इसके अलावा न किसी गवाह के बयान हैं और न षड्यंत्र करने के कोई साक्ष्य हैं। जब कभी इस तरह के दंगे की जांच के बारे में भविष्य में देखा जाएगा तो पता चलेगा कि जांच में कोई वैज्ञानिक तरीका इस्तेमाल नहीं किया गया।

अदालत ने कहा इस मामले में सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया है। किसी भी गवाह के बारे में पता भी नहीं किया गया। जांच में क्षमता का पूरा अभाव दिखता है। न्यायिक प्रक्रिया में इस तरह की जांच की अनुमति नहीं दी जा सकती। लंबी जांच के बाद पुलिस ने 5 तकनीकी गवाह पेश किए हैं। इनमें जांच अधिकारी व एक सिपाही ने तीन आरोपियों की पहचान की। सिपाही का लंबे समय के बाद बयान दिया जाना यह बताता है कि उसे प्लांट किया गया है। इस मामले में दोषी का पता लगाने के लिए सही जांच नहीं की गई।

जांच में विफलता पीड़ा देगी
जज विनोद यादव ने कहा मैं खुद को यह देखने से रोक नहीं पा रहा हूं कि दिल्ली में विभाजन के बाद के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगों के पन्नों को जब भविष्य में पलटकर देखा जाएगा, तो नवीनतम वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करके उचित जांच करने में जांच एजेंसी की विफलता निश्चित रूप से लोकतंत्र के प्रहरी को पीड़ा देगी।

उन्होंने कहा कि इस मामले में ऐसा लगता है कि चश्मदीद गवाहों, वास्तविक आरोपियों और तकनीकी सबूतों का पता लगाने का प्रयास किए बिना ही केवल आरोपपत्र दाखिल करने से ही मामला सुलझा लिया गया। अदालत ने कहा अभियोजन पक्ष ऐसा कोई साक्ष्य पेश करने में असफल रहा है जिससे आरोपियों पर अपराध साबित हो सके। ऐसे में वे तीनों को मामले से आरोपमुक्त करते हैं।
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