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मंडावली फाजलपुर : शहर में बसा एक पारंपरिक गांव, तीन चौथाई हिस्से पर आधुनिकता का कब्जा

Sun, 01 Aug 2021 06:41 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली

सार

  • रवायतें बयां कर रही हैं मंडावली की कहानी
  • मान्यता है कि आज भी बड़े चौक पर ग्राम देवता खेड़ा देवर करते हैं ग्रामीणों की रक्षा
  •  450 साल पुराने इस गांव में संजोकर रखी गई हैं कई परंपराएं
  • यही पर है पूर्वी दिल्ली का सबसे बड़ा हेडगेवार पार्क
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बरसों पुराना पीपल का पेड़... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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चौपाल पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट, बड़े-बुजुर्गों का ठाठ-बाट का पुराना अंदाज, छोटी-छोटी गलियां और उनसे गुजरते गाय व बैल। इन सबके बीच एक मंदिर और उसमें भी जगह बनाकर निकला पीपल का वृक्ष, जिसका तना कई बार मुड़ा हुआ है। दिल्ली की चकाचौंध भरे शहरीपन में गांव का यह अंदाज आपका ध्यान बरबस उस बसावट की तरफ खींच लेता है, जिसे मंडावली फाजलपुर के नाम से जाना जाता है।

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मंडावली गांव करीब 450 साल पुराना है। पहले इसका नाम फाजलपुर था। यहां गुर्जर, ब्राह्मण और अनुसूचित जातियों के लोग सौहार्दपूर्ण रहते हैं। यह दिल्ली के सर्वाधिक रकबे वाले गांवों में से एक है। गांव की आबादी करीब नौ हजार है। गांव के बुजुर्ग प्रताप सिंह नागर बताते हैं कि कभी मंडावली का रकबा 5200 बीघे का था। चार कास्तकार ऐसे थे, जिनके पास हजार-हजार बीघा भूमि थी। यमुना किनारे मंडावली की जमीन बेहद उपजाऊ थी। यहां आम के बड़े-बड़े बाग थे। खेतों में लहलहाती फसलों की हरियाली आसपास के गांवों में नहीं थी, लेकिन गांव की जमीन सरकार द्वारा अधिग्रहीत होने के बाद अब यहां ज्यादातर बस्तियां नजर आती हैं।

तीन चौथाई हिस्से में बस गई कॉलोनियां
आज अपने एक चौथाई हिस्से में मंडावली गांव बचा है। बाकी हिस्से में आईपी एक्सटेंशन की सरकारी समितियां, प्रीत विहार, निर्माण विहार, गगन विहार, स्वास्थ्य विहार जैसी बड़ी कॉलोनियां बन गई हैं। मदर डेयरी का प्लांट भी गांव में ही स्थापित हुआ। यहां पूर्वी दिल्ली का सबसे बड़ा करीब 50 बीघे में फैला डॉक्टर हेडगेवार पार्क है। 80 बीघे में बना सीनियर सेकेंडरी स्कूल है।
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विरोध न करते तो बना दी जाती लैंडफिल साइट
मंडावली गांव के लोग यदि 25 साल पहले विरोध न करते तो उनके गांव में गाजीपुर जैसी लैंडफिल साइट होती। गांव के जोहड़ में करीब 1.5 साल तक निगम ने कूड़ा डाला। जोहड़ पट जाने के बाद गांव के लोग लट्ठ लेकर खड़े हो गए और निगम को पीछे हटना पड़ा। बाद में निगम ने पटे जोहड़ के ऊपर हेडगेवार पार्क विकसित किया।

पंचायत घर हो चुका आधुनिक
मंडावली गांव के चौक पर कभी कच्ची दलान में पंचायत घर था। इसमें कई साल तक लड़कियों का सिलाई केंद्र चला। अब यह आधुनिक बरातघर की शक्ल ले चुका है। 2011 में पूर्वी निगम ने गांव के चौक को भी विकसित किया।

शिवमंदिर का 100 साल बाद जीर्णोद्धार
जितना पुराना मंडावली गांव है, यहां उतना ही पुराना शिव मंदिर है। लोगों ने अपनी आस्था और परंपराओं को आज भी संजोकर रखा है। करीब 100 साल बाद इसका जीर्णोद्धार हो रहा है। पुराने कुएं और पीपल के वृक्ष को भी संरक्षित रखा है।

परंपराओं को आगे बढ़ा रही हैं नई पीढ़ी
मंडावली गांव के बीच खेड़ा देवर हैं। गांव का विश्वास है कि बड़े चौक पर उनके ग्राम देवता उनकी हमेशा रक्षा करते हैं। महिलाएं सभी शुभ अवसरों पर यहां दीया जरूर जलाती हैं। पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी आगे बढ़ा रही है। ठाट से खाट पर पगड़ी बांधे बैठे बुजुर्ग, हुक्के की गुड़गुड़ाहट, तीज-त्योहार पर एकजुट होना यहां अभी भी जारी है।

...और 100 साल पुरानी सड़क
मंडावली गांव के लोगों ने अपना 100 साल से ज्यादा पुराना रास्ता आज भी संजोकर रखा है। कभी मंडावली मार्ग खिचड़ीपुर, दल्लूपुरा, कोंडली, घड़ौली होते हुए चिल्ला तक जाता था। आगे दिल्ली-आगरा मार्ग से जुड़ जाता था। मौजूदा समय गांव की सीमा से लगा करीब एक किलोमीटर लंबा मंडावली मार्ग आज भी वैसा ही है। समय-समय पर उसका नवीनीकरण किया जाता रहता है।
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लोग कहते हैं रोजगार है चुनौती...
गांव में ही मदर डेयरी का इतना बड़ा प्लांट लगा, लेकिन गांव के किसी एक को नौकरी नहीं मिली।
- सुरेश कुमार वर्मा

 जब से खेतीबाड़ी गई, लोग नौकरी कर रहे हैं। बड़ी संख्या में लोग किराएदारों के भरोसे जीवन बिता रहे हैं
- बिरजा चौधरी

मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है। गांव के बीच में स्थित यह मंदिर आस्था के अलावा एकजुटता का भी केंद्र है।
- प्रधान प्रताप सिंह नागर

अभी जितनी क्षमता है उतना ऊंचा शिव मंदिर बना रहे हैं। बाद में मंदिर का एक मंजिल और ऊपर निर्माण कराया जाएगा।
- चौघरी अजब सिंह

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