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सीवर और सेप्टिक टैंको में मौत के मामले : केंद्र को पक्ष बनाने के लिए आवेदन

Sun, 01 Aug 2021 06:09 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

  • अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अमित साहनी ने अपनी मुख्य याचिका में दिल्ली सरकार को हाथ से मैला ढोने वालों के हित में 2013 कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग करते हुए दायर की है
  • इस मुद्दे पर पहले से ही दायर है याचिका 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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सीवर और सेप्टिक टैंकों की मैन्युअल सफाई के कारण होने वाली मौत को रोकने व हाथ से मैला ढोने की प्रक्रिया रोकने के लिए 2013 में बने कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के लिए केंद्र को मामले में पक्ष बनाने के लिए हाईकोर्ट में आवेदन दायर किया गया है। इस मुद्दे पर पहले से ही याचिका दायर है।

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याचिका में राज्यसभा के 254वें सत्र के दौरान सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री (राज्यमंत्री) रामदास अठावले के हालिया बयान का हवाला दिया गया था कि पिछले पांच साल में हाथ से मैला ढोने के कारण कोई मौत नहीं हुई है।

अठावले ने यह बयान राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में दिया। मल्लिकार्जुन खड़गे और एल हनुमंतैया ने हाथ से मैला ढोने पर पिछले पांच साल में इसके कारण हुई मौतों और हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास का मुद्दा उठाया था।
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अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता अमित साहनी ने अपनी मुख्य याचिका में दिल्ली सरकार को हाथ से मैला ढोने वालों के हित में 2013 कानून का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के निर्देश देने की मांग करते हुए दायर की है। याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई होने की संभावना है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार रोजगार निषेध की नीति को हाथ से मैला ढोने वाले और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013 के रूप में बनाने और इसके कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा संसद के उच्च सदन के समक्ष राज्यमंत्री द्वारा दिया गया जवाब न केवल झूठा और भ्रामक है बल्कि हाथ से मैला ढोने वालों, उनके परिवारों और अन्य लोगों की दिवंगत आत्माओं के प्रति घोर संवेदनहीनता और उदासीनता को दर्शाता है जो अभी भी इस काम में हैं।

याची ने कहा कि संबंधित मंत्रालय ने इस वर्ष फरवरी में यह कहा था कि पिछले पांच वर्षों के दौरान हाथ से मैन्युअल सफाई करने व मैला ढोने वाले 340 लोगों की मौतें हुई हैं जो उच्च सदन में उठाए गए अतारांकित प्रश्न का विपरीत है।

हाईकोर्ट ने हालही में इस मामले में दिल्ली सरकार के अलावा तीनों नगर निगम, दिल्ली जल बोर्ड, दिल्ली छावनी बोर्ड और लोक निर्माण विभाग को याचिका पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था।

अदालत ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी की थी कि सरकार चुनावी विज्ञापनों पर इतना पैसा खर्च करती है और उसे हाथ से मैला ढोने के बारे में लोगों को जागरूक करने पर कुछ राशि खर्च करनी चाहिए क्योंकि हर साल इस प्रथा के कारण इतने सारे लोगों की मौत हो जाती है।

हाथ से मैला ढोने वालों के पुनर्वास से संबंधित 2007 की एक अन्य याचिका भी उच्च न्यायालय में लंबित है जिसने इस तरह की प्रथा पर रोक लगाने वाले कानून के बावजूद शहर में हाथ से मैला ढोने के अस्तित्व को %शर्मनाक% करार दिया है।

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