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अदालत की अनुमति : ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई मौतों की जांच के लिए एचपीसी के गठन की सहमति  

Wed, 22 Sep 2021 05:42 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

अदालत ने कहा कि अनुमति तभी जब दिल्ली सरकार यह स्पष्ट करे कि अस्पतालों पर कोई दायित्व तय किए बिना सरकार मुआवजे का भुगतान करेगी।
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दिल्ली हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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उच्च न्यायालय ने कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की कथित कमी के कारण हुई मौतों की जांच के लिए दिल्ली सरकार द्वारा उच्च अधिकार प्राप्त स्तरीय जांच समिति (एचपीसी) गठित करने के फैसले पर सहमति जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उसे एचपीसी के गठन में कोई दिक्कत नहीं दिखती। 

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न्यायमूर्ति विपिन सांघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह की पीठ ने एचपीसी के गठन संबंधी निर्णय को उपराज्यपाल द्वारा खारिज करने को चुनौती याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त टिप्पणी की। याची के पति की कोरोना के चलते मौत हो गई थी।

पीठ ने कहा जब दिल्ली सरकार ने स्पष्ट किया है कि समिति किसी भी अस्पताल को कोई दोषी नहीं ठहराएगी और किसी भी मुआवजे का भुगतान सरकार अकेले इसे वहन करेगी। पीठ ने कहा कि दिल्ली सरकार के अनुसार मुआवजे का निर्धारण करने का मानदंड जांच के लिए खुला होगा और इसका कार्य ऑक्सीजन के आवंटन और उपयोग पर उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित उप-समूह के साथ अतिव्याप्त (ओवरलैप) नहीं करेगा।
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पीठ ने कहा उक्त कथन के मद्देनजर हमें दिल्ली सरकार द्वारा गठित एचपीसी को उसकी नियत भूमिका निभाने में कोई आपत्ति नहीं देखती है। पीठ की यह भी राय है कि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार अनुग्रह राशि देने के संबंध में उच्चतम न्यायालय के आदेश का इंतजार करना जरूरी नहीं है।

अदालत ने कहा कि 27 मई को समिति गठित करने के संबंध में दिल्ली सरकार द्वारा जारी आदेश की मंशा कोविड-19 के पीड़ितों को अनुग्रह देने की नहीं है। पीठ ने कहा कि आदेश को पढ़ने से मालूम हो जाएगा कि इसका मकसद ऑक्सीजन की कमी के कारण कोविड से पीड़ित मरीज की मौत के संबंध में समिति को मिली हरेक शिकायत की जांच करना है।

अदालत ने साफ किया कि पीड़ितों के लिए, जो मुआवजा इस समय दिया जा रहा है, अगर एनडीएमए उससे अधिक राशि तय करती है तो पीड़ित को बढ़ी हुई रकम दी जाएगी। अदालत ने इस बात को रिकॉर्ड किया कि समिति गठित करने का फैसला विलंबित किए जाने के बाद दिल्ली सरकार ने इस समिति को बहाल करने की अपनी मंशा जाहिर की लेकिन समिति के अधिकार क्षेत्र को लेकर मंत्रिपरिषद और उपराज्यपाल के मतभेद के चलते गतिरोध जारी है।

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि वह समिति को आगे बढ़ने की अनुमति तभी देंगी जब दिल्ली सरकार यह स्पष्ट करे कि अस्पतालों पर कोई दायित्व तय किए बिना सरकार मुआवजे का भुगतान करेगी। अदालत ने सवाल किया यहां मामला कानूनी है। क्या आप किसी समिति द्वारा गलती पर आधारित दायित्व का निर्धारण तीसरे पक्ष पर डाल सकते हैं, ऐसा करना सिर्फ वित्तीय जिम्म्दारी ही नहीं डालता बल्कि पेशेवर प्रतिष्ठा को धूमिल करता है।
पीठ ने सरकार से कहा कि यदि आप कहते हैं कि आप दायित्व तय करेंगे, तो ऐसा करके आप न्यायपालिका और चिकित्सा परिषद के क्षेत्र में हस्तक्षेप करेंगे। आप यह नहीं कर सकते। 

दिल्ली सरकार की और से पेश वरिष्ठ वकील राहुल मेहरा और गौतम नारायण ने स्पष्ट किया कि समिति केवल एक तथ्यान्वेषी समिति है, जो किसी भी अस्पताल को किसी भी गलती या लापरवाही के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराएगी और मुआवजा सरकार की ओर से दिया जाएगा। अदालत को बताया गया कि समिति अपने द्वारा तय किए गए मानदंडों के आधार पर पांच लाख रुपये तक के मुआवजा तय करेगी जिसे कोई भी पक्ष चुनौती दे सकता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार द्वारा 50,000 रुपये का मुआवजा दिया जा रहा है।

उपराज्यपाल की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल संजय जैन ने अदालत से समिति गठित करने को लेकर किसी भी आदेश को टालने का आग्रह करते हुए कहा कि शीर्ष अदालत के आदेश के अनुसार एनडीएमए द्वारा एक समान अनुग्रह राशि देने के संबंध में दिशा-निर्देशों का इंतजार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत द्वारा गठित उप-समिति पहले से ही ऑक्सीजन के आवंटन और आपूर्ति और अन्य संबंधित मुद्दों के संबंध में पहलुओं को देख रही है।
पीठ ने उनके तर्क पर असहमति जताते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त समिति ‘स्थूल स्तर’ के मुद्दे देखेगी जबकि दिल्ली सरकार की प्रस्तावित समिति ‘सूक्ष्म स्थिति’ को देखेगी।

मामले में याची रिति सिंह वर्मा ने न सिर्फ दिल्ली सरकार को समिति का गठन कर काम  शुरू करने का निर्देश देने का आग्रह किया है, बल्कि मुआवजे के लिए उनके मामले को समिति को भेजने की भी गुजारिश की है। उनके पति की एक निजी अस्पताल में कोरोना वायरस के संक्रमण के इलाज के दौरान 14 मई को दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी।

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