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राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण : मोटापे की चपेट में बचपन, दिल्ली में चार साल में तीन गुना बढ़े मामले

Fri, 26 Nov 2021 04:40 AM IST
दुष्यंत शर्मा मर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली

सार

स्कूलों का बंद होना, दिनचर्या बिगड़ना और बाहरी खानपान बन रहा है अहम वजह।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
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विस्तार
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मोटापा दूर करने के लिए अक्सर चिकित्सीय सलाह देखने, सुनने और पढ़ने को मिलती है, लेकिन अब यह सरकारी आंकड़ों में भी आ चुका है कि देश की राजधानी दिल्ली में मासूम जिंदगियां तेजी से मोटापा की चपेट में आ रही हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बीते चार साल में मोटापा ग्रस्त बच्चों की संख्या तीन गुना से अधिक बढ़ गई है।

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साल 2015-16 में जब चौथा सर्वेक्षण सामने आया था तो उस दौरान दिल्ली में ऐसे बच्चों की अनुमानित संख्या तकरीबन 1.2 फीसदी थी, लेकिन अब यह बढ़कर चार फीसदी हो चुकी है। रिपोर्ट में यह स्थिति उन बच्चों में बताई जा रही है जिनकी आयु पांच वर्ष या उससे कम आयु है।

डॉक्टरों की मानें तो बच्चों में मोटापा आमतौर पर पारिवारिक माना जाता है। अगर माता-पिता मोटे हो तो उनके बच्चे भी मोटे हो सकते हैं। इनके अलावा बहुत से घरों में कोई भी सदस्य मोटा है तो बच्चे का शरीर मोटा होता जाता है, लेकिन अब चिकित्सीय वर्ग और कई अहम कारण भी मान रहे हैं जिनमें बच्चों में बढ़ती अस्वस्थ खानपान के साथ कोरोना महामारी के अलावा माता-पिता के विशेष ध्यान नहीं दे पाने जैसे कारण शामिल हैं।
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रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली में पिछले साल जब कोरोना महामारी की शुरुआत हुई थी, उससे ठीक सप्ताह भर पहले आधा सर्वेक्षण पूरा हो चुका था। चार जनवरी से 21 मार्च के बीच पहला चरण पूरा होने के बाद देश में लॉकडाउन लग गया और उसके बाद 21 नवंबर 2020 से इस साल 21 जनवरी 2021 तक दूसरा चरण पूरा किया गया।

इस दौरान सर्वेक्षण टीम ने 9486 घरों में संपर्क करते हुए 11159 महिला और 1700 पुरुषों से बातचीत करते हुए यह रिपोर्ट तैयार की है। पॉपुलेशन रिसर्च सेंटर (पीआरसी) के सहयोग से पूरा हुए इस सर्वे को सबसे ताजा बताया जा रहा है। रिपोर्ट में यह भी बताया है कि साल 2015-16 से 2019-21 के बीच दिल्ली में कम वजन वाले बच्चों की संख्या 27 से घटकर 21.80 फीसदी आई है। छोटे कद वाले बच्चों की संख्या भी 31.9 से 30.9 फीसदी हुई है। अति कमजोर बच्चों की संख्या 4.6 से बढ़कर 4.9 फीसदी तक पहुंची है। 

गांवों के बच्चे ज्यादा मोटे
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य यह हैं कि दिल्ली में शहरी क्षेत्र से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों में मोटापा दिखाई दे रहा है। शहरी क्षेत्रों के बच्चों में चार तो ग्रामीण क्षेत्रों में 4.5 फीसदी बच्चे मोटापे की समस्या से ग्रस्त हैं। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. शांतनु सेन का मानना है कि दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्रों में आधुनिक जीवनशैली की ओर बच्चों का झुकाव ज्यादा है। शहरीकरण का नुकसान अब गांवों पर भी पड़ने लगा है और यहां जागरूकता लाना जरूरी है।

विशेषज्ञों ने कहा...
कुछ समय पहले तक 10 में से एक या दो बच्चे ही मोटापा ग्रस्त दिखाई देते थे। इनमें से कुछ में मोटापा आनुवांशिक भी था। अब 10 में से कम से कम चार या पांच बच्चे ऐसी हालत में देखने को मिल जाते हैं। सिर्फ बच्चों की दिनचर्या पर ध्यान देने और माता-पिता के साथ परिवार सख्ती बरतता है तो स्वस्थ जीवन दिया जा सकता है। इसके लिए दवा या किसी जांच की जरूरत नहीं है। 
- डॉ. मनोज कुमार, बाल रोग विशेषज्ञ, लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज

जंक फूड, अत्यधिक तेल-मसाले, आए दिन बाहर का खाने की जिद हम पूरी करते हैं, लेकिन देखते ही देखते बच्चों की यह दिनचर्या बनने लगती है, जिसका परिणाम इस तरह सामने आ रहा है। जब भी इनके माता पिता से पूछो, बस कहते हैं ‘आजकल बच्चे स्वस्थ आहार कहां लेते हैं?’ सिर्फ यह बात बोलकर वे अपनी जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते हैं।
- डॉ. स्नेहा कौशिक, बाल रोग विशेषज्ञ, बालाजी एक्शन अस्पताल 

खानपान के साथ लॉकडाउन भी एक बड़ी वजह बना है। स्कूल बंद हैं, घर बैठे ऑनलाइन क्लास, न खेल पा रहे हैं और न ही बाहर निकल पा रहे हैं। बच्चों का शारीरिक रूप से व्यायाम पूरी तरह बंद है। रात में देरी से सोना, सुबह देरी से उठना। माता-पिता के साथ देर रात तक टीवी देखना और मोबाइल देखते हुए भोजन करना, ऐसी आदतें हमारे बच्चों को लग चुकी हैं। इनसे छुटकारा जरूरी है।
- डॉ. प्रियंका जैन, वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ, धर्मशिला नारायणा अस्पताल 

एक नजर 

  • दिल्ली में 6 से 59 माह के एनिमिक बच्चों की संख्या 59.7 से बढ़कर 69.2 फीसदी तक हुई। 
  • एक हजार लड़कों पर बेटियां 854 से बढ़कर 913 पर पहुंचा लिंगानुपात।


एक हजार बच्चों पर दिल्ली की स्थिति

  • नवजात मृत्युदर 17.8 से 17.5 दर्ज की गई। 
  • शिशु मृत्युदर 31.2 से कम होकर 24.5 पर पहुंची। 
  • पांच वर्ष तक के शिशु में मृत्युदर 42.2 से कम होकर 30.6 पर आई।
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