भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान(आईआईटीएम) के मुताबिक, बृहस्पतिवार को मिक्सिंग हाइट 1100 मीटर रही है। हवा की रफ्तार चार से आठ किलोमीटर दर्ज की गई है।आईआईटीएम का पूर्वानुमान है कि अगले दो दिनों तक वेंटिलेशन इंडेक्स में भी इजाफा होगा। इससे प्रदूषण को कम होने में मदद मिलेगी। बृहस्पतिवार को वेंटिलेशन इंडेक्स एक हजार वर्ग मीटर प्रति सेकेंड दर्ज किया गया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड(सीपीसीबी) के मुताबिक, दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक 28 अंकों की कमी के साथ 347 रहा है। इससे एक दिन पहले यह 375 रहा था। देश में सबसे प्रदूषित शहर भिवाड़ी दर्ज किया गया है। यहां का एक्यूआई 378 के आंकड़े के साथ सबसे अधिक रहा।
राजधानी में पराली के धुएं का प्रदूषण पर असर हवाओं के रुख और रफ्तार पर निर्भर है। दिल्ली की हवा में पराली जनित पीएम2.5 की मात्रा में रोज उतार-चढ़ाव होता है। 20 अक्तूबर से 17 नवंबर के बीच अलग-अलग दिनों में पराली ने 06-48 फीसदी तक हवाओं में प्रदूषक घोला है। दिलचस्प यह कि पराली जलने के मामलों और दिल्ली-एनसीआर पहुंचने वाले पराली के धुएं में कोई सह संबंध नहीं दिखता।
सफर के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अक्तूबर से लेकर 17 नवंबर तक अलग-अलग तारीखों पर पराली के धुएं की अलग-अलग हिस्सेदारी रही। सीजन में सबसे कम 127 जगहों पर पराली जलने की घटनाएं 26 अक्तूबर को दर्ज की गई थीं। वहीं, पराली के धुएं की प्रदूषण में सबसे कम दो फीसदी हिस्सेदारी 24 अक्तूबर को रही। सीजन में सबसे अधिक 48 फीसदी पराली के धुएं की हिस्सेदारी सात नवंबर को थी।
आंकड़ों पर गौर करें तो 20 से 26 अक्तूबर तक पराली के धुएं की हिस्सेदारी 15 से आठ फीसदी रही थी। वहीं, 27 से 29 अक्तूबर तक इसकी हिस्सेदारी में चढ़ाव के साथ 16 से 20 फीसदी रही। 30 अक्तूबर से लेकर चार नवंबर तक पराली जलने की घटनाओं में कमी देखी गई। इस दौरान इसकी हिस्सेदारी 12 से छह फीसदी तक सिमट गई। हालांकि, दिवाली की रात के बाद से इसमें इजाफा हुआ और पराली का ग्राफ 48 फीसदी तक पहुंच गया। पांच से नौ नवंबर तक पराली के धुएं की हिस्सेदारी में थोड़ी कमी हुई और यह 30 फीसदी तक बनी रही। लेकिन, 14 नवंबर तक यह 12 फीसदी तक पहुंच गई। बुधवार तक पराली के धुएं की हिस्सेदारी छह फीसदी तक सिमट गई है।
समय की कमी और खर्चे से बचने के लिए जला दी जाती है पराली
मानसून में खेती करने के बाद हर साल अक्तूबर में धान की फसल की कटाई शुरू हो जाती है। इस दौरान फसल की कटाई के लिए मशीन व मजदूरों की जरूरत होती है। मशीन से फसल की कटाई के बाद खेतों में फसल का निचला हिस्सा शेष जाता रह जाता है। इसे काटने के लिए मजदूरों की आवश्यकता होती है। लेकिन, पंजाब और हरियाणा में मजदूरों को दिए जाने वाले वेतन की दर पूरे देश की दर से अधिक है। पंजाब में फसल काटने के लिए 358 व हरियाणा में 394 रुपये दिए जाते हैं, जबकि देश में औसतन 331 रूपये दिए जाते हैं। इसलिए किसान मशीन से कटाई के बाद फसलों को आग लगा देते हैं और खेत को कम समय में ही अगली फसल के लिए तैयार कर लेते हैं।