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मजिस्ट्रेट पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने वाले पर 10 हजार का जुर्माना

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नई दिल्ली। अदालत ने मजिस्ट्रेट पर पूर्वाग्रह का आरोप लगाने वाले एक व्यक्ति पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। याची ने आरोप लगाते हुए अपने मामले को दूसरी अदालत में स्थानांतरित करने की मांग की थी। उसने आरोप लगाया था कि कार्यवाही के दौरान जज ने उसके वकील को अपनी न्यायिक शक्तियां दिखाने की धमकी दी।
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जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरीश कठपालिया ने आरोपों को निराधार और याचिका को गुणहीन बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने न्यायिक अधिकारियों को तुच्छ शिकायतों में घसीटने की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की।
अदालत ने कहा यह वास्तव में दुखद स्थिति है कि हाल के दिनों में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ रही है जहां न्यायिक अधिकारियों को कटघरे में घसीटा जाता है और उन्हें खुद के खिलाफ तुच्छ शिकायतों से लगातार अपना बचाव करना पड़ रहा है। ऐसी स्थितियों में न्यायिक अधिकारियों के पास कोई विकल्प नहीं है सिवाय खुद का बचाव करने के। न केवल कुछ वादी, बल्कि कुछ वकील भी लापरवाही भरी शिकायतें दर्ज करने से पहले नहीं सोचते हैं और योग्यता के आधार पर मुकदमा लड़ने से बचने के लिए याचिकाएं स्थानांतरित कराते हैं।
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उन्होंने कहा क्या ऐसे मामलों में, क्या सिस्टम को न्यायिक अधिकारी की गरिमा की रक्षा के लिए उसका अधिकार छीन लेना चाहिए? नहीं। उन्होंने कहा यदि मामले को संबंधित न्यायिक अधिकारी से वापस लेकर दूसरी अदालत में भेज दिया जाता है तो इस प्रकार के दृष्टिकोण से वादियों को न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आरोप लगाकर फोरम खरीदारी में लिप्त होने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि कार्यवाही को हस्तांतरित कराया जाए और टालमटोल की जाए।
याचिकाकर्ता दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14 (1) (ई) के तहत बेदखली की कार्यवाही का सामना कर रहा है। उसने अदालत के सीसीजे-सह-एआरसी जज की कार्यवाही को सक्षम अधिकार क्षेत्र के किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की थी।
अदालत ने याचिकाकर्ता को एक सीलबंद लिफाफे में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था, जिसमें न्यायिक अधिकारी की कथित टिप्पणियों की हिंदी में गवाही दी गई थी। हलफनामे में कहा गया न्यायाधीश तैश में आकर बोले कि वकील साहब आपको मेरी पावर का ज्ञान नहीं हैं। मैं आपको दिनांक 31 मार्च 21 को सुनवाई में अपनी पावर दिखाऊंगा।
अदालत ने कहा यह समझना संभव नहीं है कि बिना किसी उकसावे के संबंधित न्यायिक अधिकारी क्रोधित हो जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता द्वारा इस अदालत के समक्ष पूरी तस्वीर पेश नहीं की गई है।
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