यही हाल यमुना नदी का है। खुद दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीबी) की एनजीटी में दी गई रिपोर्ट के मुताबिक यमुना में दिल्ली और नोएडा के बीच 22 बड़े नाले गिरते हैं। इनमें से 13 नाले सीधे अपना 2,976 एमएलडी सीवर गिरा रहे हैं। केवल नौ नालों को ही अभी तक टेप किया जा सका है। यही वजह है कि कालिंदी कुंज के पास यमुना नदी में प्रदूषण अधिकतम होता है। नदी में बने झाग के रूप में यह प्रदूषण साफ देखा जा सकता है। नोएडा के डाउनस्ट्रीम में हिंडन के भी मिल जाने के बाद यह प्रदूषण और अधिक बढ़ जाता है।
नोएडा के लिए दुर्भाग्य
पर्यावरण कार्यकर्ता अभिष्ट कुसुम गुप्ता का कहना है कि यह नोएडा के लिए दुर्भाग्य ही है कि शहर दो नदियों के बीच में मौजूद है। इसके बाद भी इन नदियों से हम पानी तक अपने उपयोग के लिए नहीं ले सकते हैं। दोनों ही नदियां बुरी तरह प्रदूषित हैं। इन नदियों को प्रदूषण मुक्त करने के लिए कोई काम नहीं होता। हिंडन रिवरफ्रंट डेवलपमेंट के लिए एनजीटी के आदेश के बाद अब जरूरी कवायद शुरू हुई है।
शहर बढ़ते गए, नदियां सिमटती गईं
कभी आज के अट्टा मार्केट और सेक्टर-18 तक यमुना नदी का तट था। यहां तक आने के लिए लोग नाव का सहारा लेते थे, लेकिन यमुना-हिंडन दोआब में बसे नोएडा शहर के विकास ने नदियों को पीछे धकेलने का काम किया। शहर के अंधाधुंध विकास की दौड़ में नदियों के डूब क्षेत्र तक कब्जा कर लिया गया। आलम यह है कि हिंडन नदी में कुछ मकान बने हुए हैं।
नोएडा के मास्टर प्लान 1991, 2001 और 2011 में शहर की सीमा इतनी नहीं थी कि यह नदियों के अस्तित्व पर कोई असर डाले। लेकिन, मास्टर प्लान 2021 और 2031 ने पूरे क्षेत्र को घेर लिया। नदियों के किनारे तक धड़ाधड़ निर्माण हुए। नोएडा प्राधिकरण की ओर से पूरे जमीन का अधिग्रहण किया गया और योजनागत तरीके से इसे बिल्डरों को बेच दिया गया। अब आलम यह है कि नोएडा में जमीन नहीं बची है। इसी दौरान भूमाफियाओं ने प्राधिकरण की लापरवाही का फायदा उठाते हुए कृषि एवं पशुपालन वाली जमीन पर भी कब्जा जमाना शुरू किया। नदियों के किनारे तक प्लॉट काटे गए। पिछले वर्ष यमुना नदी में आई आंशिक बाढ़ का असर यह रहा कि डूब क्षेत्र में बने फॉर्महाउस डूब गए। काफी मशक्कत के बाद उनको बाहर निकाला गया।
भविष्य में नदी ने अपना रास्ता बनाया तो खतरे में होगी जान
मास्टर प्लान के तुलनात्मक अध्ययन में यह बातें सामने आई थीं कि अगर सामान्य से अधिक बारिश होगी तो नोएडा के कई इलाके डूब जाएंगे। इसके अलावा दोआब की जमीन बड़ी इमारतों के लिए काफी खतरनाक साबित होती है। इसके किनारों पर बनी इमारतें नीचे से पानी का दबाव झेलती हैं जो भूकंप के दौरान झटका सह नहीं पातीं। दिल्ली के ललिता पार्क में इमारत धंसने का करीब 12 साल पहले का हादसा इस बात का गवाह है। भविष्यवाणी तो यहां तक की गई है कि अगर भविष्य में नदियों ने अपना पुराना रूप धारण किया तो लोगों की जान खतरे में होगी।