फरीदाबाद। कोरोना काल में बिना परीक्षा जारी हुए परीक्षा परिणाम में न केवल राज्य व जिला बोर्ड के टॉपर से वंचित रहे बल्कि स्कूलों में भी असमंजस की स्थिति बन गई है। एक-एक स्कूल में 80 फीसदी बच्चे शत प्रतिशत परीक्षा परिणाम के साथ पास हुए हैं। ऐसे में सौ फीसदी अंक वालों का बोलबाला है। इसका मुख्य कारण आंतरिक मूल्यांकन व व्यवहारिक परीक्षा के 20-20 अंकों का शत प्रतिशत औसत रहा।
इस बार बोर्ड ने स्कूलों की ओर से प्रैक्टिकल और आंतरिक मूल्यांकन में दिए जाने वाले अंकों के आधार पर ही लिखित अंकों का औसत निर्धारित कर बच्चों का बोर्ड परीक्षा परिणाम जारी किया। इसी कारण न तो इस बार कोई विद्यार्थी फेल हुआ न ही बच्चा टॉपर हो सका। शिक्षाविद मानते हैं कि बच्चों को मेरिट तक पहुंचाने के लिए स्कूल अमूमन इन नंबरों को अधिकतम देने का प्रयास करते हैं। ऐसे में कोरोना काली में जारी हुआ परीक्षा परिणाम पूरे प्रदेश में सौ फीसदी रहा। वहीं, अब स्कूल अपने स्तर टॉपर का निर्धारण नहीं कर पा रहे हैं, इसके लिए स्कूल एसोसिएशन ने सुझाव दिया है कि सभी शत प्रतिशत अंक हासिल करने वाले परीक्षार्थियों में से सबसे कम उम्र के विद्यार्थी को टॉपर की संज्ञा दी जानी चाहिए।
सेक्टर-55 स्थित मॉडल संस्कृति स्कूल के प्रधानाचार्य सतेंद्र सौरोत बताते हैं कि उनके स्कूल में 10वीं कक्षा में सौ फीसदी परीक्षा परिणाम रहा। स्कूल में 90 फीसदी से अधिक बच्चे शत प्रतिशत परिणाम के साथ पास हुए हैं। मोहन ऋषि स्कूल के संचालक मनीष गौतम बताते हैं कि उनके स्कूल में 40 विद्यार्थी दसवीं बोर्ड के परीक्षार्थी थे। इसमें से पांच विद्यार्थी सौ फीसदी वाले हैं। पांच बच्चे ऐसे हैं जो 90 से 95 फीसदी के साथ हैं। ऐसे में वह टॉपर का निर्धारण उम्र के आधार पर करेंगे। इसी तरह बल्लभगढ़ प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के प्रधान चंद्रभान ने बताया कि वह हर वर्ष स्कूलों के टॉप-3 बच्चों को सम्मानित करते थे। इस बार कि स्थिति है कि हर स्कूल में 80 फीसदी विद्यार्थी 500 में से 500 अंक लेकर पास हैं। ऐसे में वह प्रत्येक स्कूल के एक बच्चे को ही एसोसिएशन की ओर से सम्मानित करने का सुझाव दे चुके हैं। इसके लिए सबसे कम उम्र के ऐसे बच्चे को टॉपर की संज्ञा दी जाएगी जो सौ फीसदी अंकों के साथ पास हुआ हो।