याची ने कहा कि इस तरह का भेदभाव संवैधानिक योजना के विपरीत है और इसलिए, पूर्व दृष्टया असंवैधानिक, अवैध और मनमाना है। अक्तूबर 2018 में उच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर निर्णय लेने के लिए केंद्र को समय देते हुए अपनी नर्सिंग सेवा में केवल महिलाओं को रखने की भारतीय सेना की प्रथा को लैंगिक भेदभाव के रूप में समाप्त कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने सेना में केवल महिला नर्स रखने की कथित असंवैधानिक प्रथा से संबंधित एक याचिका पर केंद्र से जवाब मांगा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी व न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की पीठ ने भारतीय पेशेवर नर्स संघ के आवेदन पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। आवेदन में महिला उम्मीदवारों (केवल) को सैन्य नर्सिंग सेवा में शामिल होने के लिए आमंत्रित करने वाले केंद्र सरकार के विज्ञापन पर रोक लगाने की मांग की गई है। अदालत ने केंद्र को छह सप्ताह का समय प्रदान करते हुए सुनवाई 29 जुलाई तय की है।
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आवेदन केवल महिलाओं की सैन्य नर्सों के रूप में नियुक्ति की अवैध प्रथा को चुनौती देने वाली एसोसिएशन की लंबित याचिका में दायर किया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील डॉ. अमित जॉर्ज ने कहा कि आवेदन पुरुषों के खिलाफ भेदभावपूर्ण प्रथा को जारी रखने से संबंधित है, जो विशुद्ध रूप से एक स्टीरियोटाइप पर आधारित है और विज्ञापन संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन है। आवेदन में याचिकाकर्ता ने कहा कि याचिका लंबित होने के बावजूद सार्वजनिक रोजगार में नर्सों की भावी पीढ़ी के लिए स्पष्ट रूप से अवैध और घृणित लिंग भेदभाव प्रथा को बनाए रखने की मांग करना स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है।
इंडियन प्रोफेशनल नर्सेज एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा है कि भारत में कई हजार पुरुष प्रशिक्षित और पेशेवर नर्स के रूप में योग्य हैं और सेना के नर्सिंग कोर से उनकी चूक अन्यायपूर्ण और असंवैधानिक है क्योंकि यह उन्हें रोजगार के अवसर से वंचित करती है। जनहित याचिका में मिलिट्री नर्सिंग सर्विस ऑर्डिनेंस 1943 और मिलिट्री नर्सिंग सर्विस (इंडिया) रूल्स 1944 के प्रावधानों को उस हद तक चुनौती दी गई है, जब तक वे केवल महिलाओं की नियुक्ति के लिए प्रावधान करते हैं।