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अर्श पर पहुंची ट्यूबवेल ऑपरेटर की बेटी, बॉक्सिंग में चमका नाम

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शहर की एक और होनहार प्रतिभा ने जिले का ही नहीं पूरे प्रदेश का नाम रोशन किया है। सेक्टर-25 में रहने वाली आलिया खान भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) में भावी खिलाड़ियों को बॉक्सिंग के गुर सिखाएंगी।
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आलिया को सरकारी कोच नियुक्त किया गया है। उनके पिता इस्लाम खान नगर निगम में ट्यूबवेल ऑपरेटर का काम करते हैं। इस मुकाम तक पहुंचने वाली आलिया के लिए रास्ता इतना आसान नहीं था।

इस नौकरी को पाने के लिए उन्होंने अथक मेहनत की और लोगों की संकीर्ण सोच को दरकिनार कर अपने लक्ष्य पर निशाना साधा। मूल रूप से मेवात के बेहद पिछड़े गांव बीमा पहाड़ी की रहने वाली आलिया खान बॉक्सिंग कोच बनने वाली पहली व एकमात्र मुस्लिम महिला हैं।
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आलिया का परिवार इस समय सेक्टर-25 में रहता है। पिता इस्लाम खान बताते हैं कि 14 साल की आलिया जब 10वीं की पढ़ाई कर रही थी, तभी उसे बॉक्सिंग सीखने की ललक पैदा हुई। क्योंकि उनके स्कूल में कोच रमेश वर्मा लड़कियों को बॉक्सिंग की कोचिंग देते थे।

आलिया के कहने पर पहले तो उन्होंने समाज के डर से मना किया, लेकिन उसकी जिद के आगे झुकना पड़ा। वह अपनी बेटी को लेकर कोच रमेश वर्मा के पास गए।

रूढ़िवादी सोच ने कई बार रोका रास्ता

खिलाड़ियों की संख्या ज्यादा होने पर कोच ने इनकार कर दिया, लेकिन आलिया की ललक व जिद देखकर कोच वर्मा का दिल पसीज गया। आमतौर पर खिलाड़ी पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं, लेकिन आलिया ने इस सोच को भी बदल दिया।

अपने जबरदस्त पंच के दम पर जिला, यूनिवर्सिटी, इंटर यूनिवर्सिटी से लेकर नेशनल चैंपियनशिप में दबदबा कायम किया तो पढ़ाई में भी अव्वल रहीं। पहले नेहरू कॉलेज से बीए किया।

इसके बाद रोहतक के जाट कॉलेज बीपीएड और फिर एनएसएसआईएस पटियाला में बेहतर पढ़ाई और खेल के दम पर साई में चयनित हो गईं। अब वह कोचिंग के जरिये नए खिलाड़ियों को आगे बढ़ाएंगी।

आलिया कोचिंग सेंटर में आने वाली पहली लड़की थी। मुझे उस पर नाज है। इस लड़की में जीतने की ललक थी। इसमें मैंने कभी डर जैसी कोई चीज नहीं देखी। शुरुआत से कुछ करने का जुनुन था। इस कारण वह आज इस मुकाम पर पहुंची है। -रमेश वर्मा, बॉक्सिंग कोच
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कई रिकार्ड हैं नाम

आलिया में हुनर तो था लेकिन संसाधनों के अभाव में प्रतिभा उजागर नहीं हो पा रही थी। कॉलेज प्रबंधन की तरफ से आलिया को आगे बढ़ाने की पूरी कोशिश की गई। नतीजा आज सबके सामने है। आज वह कोच के रूप में प्रतिष्ठित हो गई। -इंदू दहिया, पूर्व प्राचार्या, नेहरू कॉलेज

पिता इस्लाम खान बताते हैं जब लोग आलिया की बॉक्सिंग ड्रेस को लेकर कानाफूसी करते थे तो उन्हें दुख होता था। अक्सर लोग कहते थे लड़की को इतनी छूट मत दो, पछताओगे।

लेकिन समाज की इस रूढ़िवादी सोच को दरकिनार कर पिता इस्लाम व आलिया ने अपने लक्ष्य पर पैनी नजर रखी। इसकी बदौलत अब वह सरकारी कोच बन गई है। अपनी कामयाबी के लिए आलिया अपने पिता की मेहनत को श्रेय देती हैं। आलिया गरीब बच्चों को बॉक्सिंग में लाने का प्रयास करना चाहती हैं।

•2005 में बंसी विद्या निकेतन के सरकारी कोचिंग सेंटर में दाखिला।
•2008 में स्कूल स्तरीय टूर्नामेंट में पहला सिल्वर मेडल जीता।
•2009 में फरीदाबाद में आयोजित स्टेट वुमन बॉक्सिंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता।
•2009 में भिवानी में स्टेट बॉक्सिंग ओपन टूर्नामेंट में दोबारा गोल्ड मेडल जीता।
•2010 में एमडीयू में आयोजित इंटर कॉलेज टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता।
•2011 में शिमला में ऑल इडिया इंटर यूनिवर्सिटी बॉक्सिंग टूर्नामेंट में सिल्वर मेडल जीता।
•2012 में रांची(झारखंड) में ऑल इडिया इंटर यूनिवर्सिटी टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीता।
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