कभी युवाओं को लुभाने वाले कॉरपोरेट जॉब्स का ग्लैमर अब सेना की वर्दी के आकर्षण के सामने फीका पड़ता जा रहा है। आज युवा सिर्फ दस से पांच बजे की नौकरी की बेड़ियों में नहीं बंधना चाहते। उनका लक्ष्य पैसे के साथ सम्मान और गर्व कमाना भी है। यही कारण है कि मोटे पैकेज देने वाली मल्टीनेशनल कंपनियों (एमएनसी) के बजाय वे सेना में जाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।
मोहणा मासी, अल्मोड़ा निवासी सुरेश देवतुल्या ऐसे युवाओं में से एक हैं। उन्हें अपने फौजी पिता माधवानंद देवतुल्या से फौज में शामिल होने की प्रेरणा मिली। उनके नाना और मां मुन्नी देवतुल्या लगातार उन्हें प्रोत्साहित करते रहे।
आर्मी स्कूल हेमपुर, रामनगर से शिक्षा प्राप्त करने के बाद सुरेश ने एलपीयू जालंधर से बीटेक किया। सैन्य वर्दी का आकर्षण उन्हें फौज की तरफ ले आया। शनिवार को भारतीय सैन्य अकादमी में पासिंग आउट परेड के बाद बेटे को अफसर की वर्दी में देखकर मां-पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।
इसी तरह रिखणीखाल, पौड़ी के मनिगांव निवासी पंकज पटवाल बचपन से ही फौज में अफसर बनने का सपना देखते थे। फौजी पिता प्रेम सिंह पटवाल की वर्दी उन्हें खूब भाती थी। मां सावित्री पटवाल भी बेटे को फौज में देखना चाहती थीं, लेकिन अफसर की वर्दी में।
आर्मी स्कूल पुणे से पढ़ाई के बाद उन्होंने एनडीए का टेस्ट दिया, लेकिन सिलेक्शन नहीं हो सका। तब पिता ने उनका हौसला बढ़ाया और सीडीएस के जरिये दोबारा प्रयास करने की सलाह दी। एमजीआर चेन्नई से बीटेक करने के बाद पंकज ने सीडीएस क्वालिफाई किया और फौज में बतौर अफसर शामिल होकर परिवार की सैन्य परंपरा को भी कायम रखा।