फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Varunavat Parvat: भूस्खलन से दहशत...21 वर्ष पहले ढंग से उपचार होता तो दोबारा नहीं दरकता वरुणावत

Sun, 08 Sep 2024 06:19 PM IST
अलका त्यागी विपिन नेगी, संवाद न्यूज एजेंसी, उत्तरकाशी

सार

वर्ष 2003 में वरुणावत पर तीन स्थानों से भूस्खलन सक्रीय हुआ था। इस कारण बस अड्डे पर बहुमंजिला होटलों के साथ ही 81 सरकारी और गैर सरकारी भवन जमींदोज हो गए थे।
विज्ञापन
वरुणावत पर्वत - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

वर्ष 2003 में वरुणावत पर्वत से हुए भूस्खलन के बाद हुए ट्रीटमेंट के लिए जनपद और प्रदेश के पर्यावरणविदों ने शासन-प्रशासन को वनास्पतिक उपचार का सुझाव दिया था। पर्यावरणविदों का कहना है कि जिस तरह का वानस्पतिक उपचार होना चाहिए था वैसा नहीं हुआ। पर्वत के शीर्ष पर ट्रीटमेंट के नाम पर लगाए गए सीमेंट की उम्र समाप्त हो गई है। इस कारण उस पर पानी रिसने और भूकंप, वनाग्नि की हलचलों के कारण पहाड़ पर जहां मिट्टी कच्ची है। वहां से 21 वर्ष बाद भूस्खलन सक्रीय हो गया है।

विज्ञापन


वर्ष 2003 में वरुणावत पर तीन स्थानों से भूस्खलन सक्रीय हुआ था। इस कारण बस अड्डे पर बहुमंजिला होटलों के साथ ही 81 सरकारी और गैर सरकारी भवन जमींदोज हो गए थे। उसके बाद केंद्र सरकार ने करीब 282 करोड़ की धनराशि वरुणावत ट्रीटमेंट के लिए दिए थे। उसमें वरुणावत पर्वत के भूस्खलन जोन के ट्रीटमेंट के साथ ही वहां पर पानी को रोकने के लिए घास लगाई थी। इसके साथ ही ताबांखाणी में सुरंग का निर्माण किया गया। पर्यावरणविद सुरेश भाई बताते हैं कि वरुणावत त्रासदी के समय प्रदेश के विभिन्न स्थानों से पर्यावरण संरक्षण से जुड़े लोग यहां पर एकत्रित हुए। जो कि लगातार ट्रीटमेंट कार्यों की निगरानी भी कर रहे थे।

Nikay Chunav 2024: उत्तराखंड में परिसीमन पूरा, अब निकायों के चुनाव के लिए ओबीसी सर्वे और वोटर लिस्ट संशोधन तेज

विज्ञापन
विज्ञापन



उस समय सभी पर्यावरणविदों ने शासन-प्रशासन को सुझाव दिया था कि यहां पर सीमेंट की बजाय क्रेट वाल लगाकर झाड़ीदार वृक्ष सहित जड़ी-बूटी और बांज-बुरांश के पेड़ लगाए जाएं। इससे पहाड़ पर वजन भी नहीं बढ़ेगा और पानी को रिसने से भी रोकेगा। लेकिन इन सुझावों को दरकिनार कर दिया गया। सुरेश भाई ने कहा कि वैज्ञानिक तरीकों से वहां पर सीमेंट का लेप लगाकर घास लगाई गई। लेकिन आज उस घास का कुछ पता नहीं,तो वहीं अगर निगरानी न की जाए। तो सीमेंट की उम्र मात्र 20 से 25 वर्ष की होती है।

जो कि अब वरुणावत के ऊपर समाप्त हो गई है। यही कारण है कि वहां स भारी बरसात का पानी पहाड़ में रिस रहा है। तो वहीं जनपद में लगातार आ रहे भूकंप के झटकों और वनाग्नि के कारण पहाड़ कच्चा पड़ गया है। इसके साथ ही जहां पर भी पहाड़ी मिट्टी कमजोर पड़ रही है। वहां से भूस्खलन सक्रीय हो गया है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें