उस समय सभी पर्यावरणविदों ने शासन-प्रशासन को सुझाव दिया था कि यहां पर सीमेंट की बजाय क्रेट वाल लगाकर झाड़ीदार वृक्ष सहित जड़ी-बूटी और बांज-बुरांश के पेड़ लगाए जाएं। इससे पहाड़ पर वजन भी नहीं बढ़ेगा और पानी को रिसने से भी रोकेगा। लेकिन इन सुझावों को दरकिनार कर दिया गया। सुरेश भाई ने कहा कि वैज्ञानिक तरीकों से वहां पर सीमेंट का लेप लगाकर घास लगाई गई। लेकिन आज उस घास का कुछ पता नहीं,तो वहीं अगर निगरानी न की जाए। तो सीमेंट की उम्र मात्र 20 से 25 वर्ष की होती है।
जो कि अब वरुणावत के ऊपर समाप्त हो गई है। यही कारण है कि वहां स भारी बरसात का पानी पहाड़ में रिस रहा है। तो वहीं जनपद में लगातार आ रहे भूकंप के झटकों और वनाग्नि के कारण पहाड़ कच्चा पड़ गया है। इसके साथ ही जहां पर भी पहाड़ी मिट्टी कमजोर पड़ रही है। वहां से भूस्खलन सक्रीय हो गया है।