विधि-विधान के साथ कंडी में विराजमान मूर्ति को मंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया गया। इस मौके पर पुजारियों द्वारा पूजा-अर्चना करते हुए धार्मिक परंपराओं का निर्वहन किया गया।
यहां मंदिर परिसर में सैकड़ों कुंतल लकड़ी से 12 फीट ऊंचा यज्ञकुंड तैयार किया गया है, जिसे स्थानीय भाषा में मूंडी कहा जाता है, की पूजा-अर्चना की गई। रात्रि आठ बजे पुजारियों द्वारा विशेष अनुष्ठान के साथ यज्ञकुंड में अग्नि प्रज्जवलित की गई। इसके बाद रात्रि चार पहर आराध्य की पूजा-अर्चना होगी।
गुरुवार दोपहर बाद नारायणकोटी से जाख देवता के पश्वा मदन सिंह राणा भक्तों के साथ नाराणकोटी, कोठेड़ा होते हुए विंधवासनी मंदिर पहुंचेंगे। यहां पर अल्प विश्राम के बाद देवशाल के वेदपाठियों के साथ देवता के पश्वा जाखधार मंदिर पहुंचेंगे। जहां पर परंपरानुसार पूजा-अर्चना के साथ आराध्य धधकते अंगारों पर नृत्य करेंगे।
इस मौके पर पंडित मनोहर देवशाली, विनोद देवशाली, महेंद्र देवशाली, तुलसीराम देवशाली, विजय रावत, मनोहर देवशाली, पूर्व दायित्वधारी अशोक खत्री, सुरेंद्र दत्त नौटियाल समेत अन्य ग्रामीण मौजूद थे।