कहीं बारिश अधिक हो रही है तो कहीं कम। कभी बर्फ बहुत अधिक गिर रही है तो कभी बहुत कम। पर्यावरण में आए इस बदलाव के कारण हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले भालुओं के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के एक शोध के बाद पता चला है कि सर्दियों में पूरे चार माह तक चिर निंद्रा में रहने वाले भालू अब वर्षभर जाग रहे हैं। संस्थान के वरिष्ठ वैज्ञानिक प्रो. सत्य कुमार का कहना है कि पर्यावरणीय असंतुलन के अलावा इसकी एक वजह मानवीय गतिविधियां भी हैं।
मानव कस्बों से चार-पांच किमी की दूरी पर बने डंपिंग जोन भालुओं को अब वर्षभर खाना उपलब्ध करा रहे हैं। उन्होंने अपने प्राकृतिक वास का छोड़कर इन्हीं डंपिंग जोन के आसपास अपने रहने की जगह भी ढूंढ ली हैं। दिन में तो इन डंपिंग जोन में केवल बंदर और लंगूर दिखाई देते हैं, जबकि रात के समय भालू और तेंदुए जैसे जानवर भी सक्रिय हो जाते हैं। इसके वासस्थल आबादी के करीब होने के कारण भी मानव के साथ इनका संघर्ष बढ़ा है।
जंगल के आसपास के आबादी वाले क्षेत्रों में पिछले 20 से 30 सालों में मानव बस्तियों से हुए पलायन के बाद यहां जंगली जानवरों की गतिविधियां बढ़ गई हैं। मानव कम होने से आसपास अस्थायी वन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। जिससे जानवरों को छिपने की जगह मिल रही है। हमारी रैपिड रिस्पांस टीम टिहरी, पौड़ी, उत्तरकाशी में बेहतर काम कर रही हैं। लोगों को सॉलिड वेस्ट का बेहतर ढंग से निस्तारण करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
- राजीव भरतरी, प्रमुख वन संरक्षक (हॉफ), वन विभाग
हिमालयी भालू और हिमालय तेंदुए आमतौर पर सीमांत क्षेत्रों के स्नो जोन में विचरण करते हैं। इनके व्यवहार के दो कारण हो सकते हैं। एक तो फूड चेन का कमजोर पड़ना और दूसरा मानव की ओर से फेंके गए खाने की इन्हें आदत पड़ना, स्नो लैपर्ड की बढ़ती संख्या बताती है कि इन्हें खाने की कमी नहीं है। इनके मुंह पर मानव भोजन का स्वाद लग चुका है। जो इन्हें मानवीय बस्तियों की ओर खींच रहा है।
- अनिल शर्मा, वन्यजीव सलाहकार बोर्ड के पूर्व सदस्य