वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली बर्फबारी के बाद जब गर्मी में बर्फ पिघलती है तो चट्टानों और मिट्टी को मुलायम बना देती है। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ढलानों पर गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने की वजह से चट्टानें और मिट्टी नीचे खिसकने लगती हैं। यही भूस्खलन का कारण बनतीं हैं।
इतना ही नहीं वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के चलते उत्तराखंड समेत देश के तमाम पर्वतीय राज्यों में कम समय में बहुत अधिक बारिश भी भूस्खलन का कारण बन रही है। वैज्ञानिकों की बातों पर यकीन करें तो उत्तराखंड समेत देश के तमाम हिमालयी राज्यों में अंधाधुंध तरीके से सड़कों के निर्माण समेत तमाम विकास कार्य, वनों की कटाई और जलाशयों से पानी का रिसाव भूस्खलन का बड़ा कारण साबित हो रहा है।
आखिर कितने प्रकार का होता है भूस्खलन
वैज्ञानिकों के अनुसार भूस्खलन कई प्रकार के होते हैं, जिसमें स्लाइड्स, फाल्स, प्रवाह, मलबे का प्रवाह, मलबा हिमस्खलन, मड फ्लो, टोपल्स, फैलाव समेत कई प्रकार होते हैं।
260 फीट प्रति सेकंड की गति से होता है भूस्खलन
वैज्ञानिक शोधों में यह बात सामने आई है कि उत्तराखंड समेत दुनिया में भूस्खलन की जितनी भी बड़ी घटनाएं हुईं, उनमें से ज्यादातर में भूस्खलन की गति 260 फीट प्रति सेकंड के आसपास रही। वैज्ञानिकों की मानें तो गुरुत्वाकर्षण बल अधिक होने के कारण भूस्खलन के दौरान मलबा तेजी से नीचे गिरता है और भारी तबाही होती है।
देश में कुल भूमि का 12 फ़ीसदी क्षेत्रफल भूस्खलन प्रभावित
आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में कुल जमीन में से 12 फ़ीसदी जमीन ऐसी है जो भूस्खलन के लिहाज से संवेदनशील है। भूस्खलन के लिहाज से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के अलावा देश के पश्चिमी घाट में नीलगिरि की पहाड़ियां, कोंकण क्षेत्र में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और गोवा, आंध्र प्रदेश का पूर्वी क्षेत्र, पूर्वी हिमालय क्षेत्रों में दार्जिलिंग, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश, पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड के कई इलाके भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं।