पहाड़ियों के मन में अपने पहाड़ के लिए प्यार जगाने और उन्हें अपनी बोली से जोड़ने के लिए प्रेरित करने के बाद अब ‘लाटी’ नशामुक्ति की लड़ाई जीतने चली है। लाटी (कार्टून का नाम) का किरदार लाकर लोगों के बीच चर्चाओं में आई कंचन जदली का सहयोग अब कई विभाग भी अपने योजनाओं के प्रचार के लिए लेंगे। अपने डिजिटल आर्ट के जरिये कंचन ने प्रवासियों को पहाड़ से जोड़ने का काम किया है। अब वह लाटी के माध्यम से ही युवाओं को नशामुक्ति का संदेश देंगी।
पहाड़ी कार्टून चित्रों और गुदगुदाती पंचलाइन से चर्चाओं में आई कंचन जदली का अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाने व जागरूक करने का माध्यम लाटी सोशल मीडिया पर छाया हुआ है। यही कारण है कि समाज कल्याण विभाग भी कंचन के लाटी आर्ट के जरिये अपने नशा मुक्ति अभियान को आगे बढ़ाना चाहता है। कंचन ने बताया कि समाज कल्याण के साथ ही उन्हें महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से भी प्रस्ताव मिला है।
पौड़ी जिले के लैंसडौन निवासी कंचन जदली ने फाइन आर्ट्स में चंडीगढ़ के गवर्मेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स से स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई पूरी की है। उनके पिता रमेश जदली व माता शशि जदली भी अपनी बेटी के काम से बेहद खुश हैं।
उनका कहना है कि बेटी ने जो काम चुना वह सामाजिक सरोकार से संबंधित है, जो उन्हें गौरवान्वित महसूस कराता है। कंचन अभी तक सौ से ज्यादा लाटी सीरीज के कार्टून बना चुकी है। लाटी आर्ट को पर्यटन विभाग ने अपने फेसबुक पेज पर शेयर कर सराहा। अब अन्य विभाग भी लाटी के जरिये अपने महत्वपूर्ण अभियानों का प्रचार करना चाहते हैं।
इन कार्टून चित्रों और पंचलाइन से आई थीं चर्चा में
-पहाड़ों की शान नथुली, गुलबंद, पिछौड़ा और पहाड़ी बांद।
-होगा टाटा नमक देश का नमक, पहाड़ियों का नमक तो पिसयू लूण है।
एनिमेशन की वीडियो क्लिप भी
कंचन अपने एनिमेशन की वीडियो क्लिप भी बनाती है। इसी सीरीज में मकरैणी, घुगते बांटते लोगों को खूब पसंद आए।
लाटी आर्ट एक अलग व सशक्त माध्यम है। हमारी तरफ से इस संबंध में कंचन को पत्र सौंपा जा चुका है। नशा मुक्ति अभियान में हम लाटी आर्ट का सहयोग लेंगे। इसमें पोस्टर, विभिन्न स्थानों पर वॉल पेंटिंग आदि शामिल हैं।
- हेमलता पांडे, समाज कल्याण अधिकारी
मैंने बहुत से कार्टून देखे, जिनका इस्तेमाल जागरुकता अभियान के लिए किया जाता है। मगर सबमें दिक्कत मुझे एक ही लगती थी। जब हम अपने राज्य अपने पहाड़ की बात कर रहे हैं, तो हम वहां की वेशभूषा, भाषा और लोगों के आमजीवन को क्यों भूल जाते हैं। हमें संदेश उन्हीं ग्रामीणों के बीच लेकर जाना है, तो जरूरी है कि हम उनकी भाषा में उनके बीच के ही पात्र चुनें। बस मैंने वही किया।
- कंचन जदली