सीमांत इलाकों में बजाय सड़कों और पुलों के निर्माण की जगह यदि रोपवे कनेक्टिविटी पर ध्यान दिया जाए तो ज्यादा कारगर हो सकता है। अकसर यहां अतिवृष्टि के बाद पुल, सड़कें बह जाती हैं। उत्तराखंड आपदाओं वाला प्रदेश है, इसलिए यहां सड़कों और दूसरी परियोजनाओं का निर्माण गहन अध्ययन के बाद ही किया जाना चाहिए। हमारे पहाड़ कच्चे हैं, इनकी तिरछी ढलानों से छेड़छाड़ जोखिमभरी हो सकती है। तोताघाटी और लामबगड़ इसके ताजे उदाहरण हैं।
-प्रो. रवि चोपड़ा (चारधाम मार्ग पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित हाई पावर कमेटी के अध्यक्ष)
सड़कों के निर्माण में अनियंत्रित और अवैज्ञानिक विस्फोटक घातक
पहाड़ी क्षेत्रों में जल्दबाजी के चक्कर में सड़कों के निर्माण में डायनामाइट विस्फोट अनियंत्रित और अवैज्ञानिक तरीके से किए जाते हैं। इससे भूस्खलन और दूसरी दिक्कतें बढ़ जाती हैं। दूसरा प्रश्न है, सड़क निर्माण के दौरान भूस्खलन को कैसे कम किया जाए। इसके लिए जरूरी है कि हम सड़क निर्माण के साथ ढलानों का भी वैज्ञानिक तरीके से साथ-साथ ट्रीटमेंट करते हुए आगे बढ़ें। उत्तराखंड में ऐसा नहीं हो रहा है। बेहतर तो यह होगा कि लैंडस्लाइड जोन को छेड़ा ही न जाए।
- डॉ. पीसी नवानी, पूर्व निदेशक, जियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया और पूर्व निदेशक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रॉक माइनिंग
सड़कों के निर्माण की तकनीक में और विकास की आवश्यकता
प्रदेश के विकास में सड़कों के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता है। हमें भविष्य में टिकाऊ विकास को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनानी होंगी। नवोन्मेषी अनुसंधान के बाद ही आगे बढ़ना होगा। लोनिवि के पास की इसकी बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन यहां भी इसकी कमी है। हालांकि अभी हाल ही में विभाग मुख्यालय स्तर पर एक नया डिजाइन एवं रिसर्च विंग बनाया गया है, लेकिन यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था।
- शरद कुमार बिरला, रिटायर चीफ इंजीनियर, लोनिवि