त्रिवेंद्र ने कहा कि बदरी-केदारनाथ समिति में 47 मंदिर पहले से थे। जिनमें से चार मंदिरों के पुजारियों ने स्वयं लिखकर दिया था कि उन्हें देवस्थानम बोर्ड में शामिल कर लिया जाए। जो समर्थन कर रहे हैं उनको नहीं सुना जा रहा है। अभी केवल उनकी सुनाई दे रही है, जो लोग विरोध कर रहे हैं। जिन लोगों ने स्वयं स्वीकार किया है। जो लोग समर्थन कर रहे हैं। उनको भी सुना जाना चाहिए।
सवा सौ करोड़ हिंदुओं की भावनाओं का भी सम्मान होना चाहिए
तमाम मंदिरों विशेषकर चारों धामों पर देश-दुनिया के सवा सौ करोड़ हिंदुओं का अधिकार है। उनकी भावनाओं का भी सम्मान होना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं। उसको भी देखा जाना चाहिए। वह त्रिजुगीनारायण, गोपीनाथ मंदिर, बदरीनाथ, भविष्य बदरी गए, वहां किसी न कोई विरोध नहीं किया।
परिवर्तन चाहते हैं तो विरोध सहना होगा
त्रिवेंद्र ने कहा कि वास्तव में हम परिवर्तन चाहते हैं तो हमको ये विरोध भी बर्दाश्त करना चाहिए। जब कोई बड़ा सुधार होता है तो उसका विरोध होता है। सती प्रथा, बाल विवाह व विधवा विवाह का भी विरोध हुआ। यदि हम जनता का समर्थन चाहते हैं, तो लोगों के विरोध के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए।