ऊंचाई वाले गांवों में पाई जाती बिच्छू बूटी
रुद्रप्रयाग जिले के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बिच्छू बूटी पाई जाती है। वर्तमान में इसका उपयोग मंदाकिनी बुनकर समिति देवलीभणि ग्राम के माध्यम से किया जा रहा है। संस्था द्वारा बिच्छू बूटी से सोफा कवर, मैट के साथ ही ऊन को मिलाकर जैकेट भी बनाई जा रही हैं। मंदाकिनी बुनकर समिति के संस्थापक डाॅ. हरिकृष्ण बगवाड़ी का कहना है बिच्छू बूटी के पौधे की लंबाई ढाई से तीन मीटर तक होती है। इससे धागे को तैयार करने की प्रक्रिया काफी जटिल है, जो पारंपरिक विधि से किया जाता है। एक क्विंटल बिच्छू बूटी से 25 से 30 किलो रेशा तैयार होता है। जिसकी कीमत तीन से चार हजार रुपये किलो तक है। ऊखीमठ के पर्यटन ग्राम सारी में भी काश्तकार प्रदीप भट्ट भी बिच्छू बूटी से रेशा बनाने का काम करते हैं। वह बताते हैं कि पारंपरिक प्रक्रिया में काफी समय लगता है।
ऐसे तैयार किया जाता है रेशा
बिच्छू बूटी के पौधे की लंबाई से ढाई से तीन मीटर तक होती है। इसे जंगलों से गटठर में लाया जाता है। इसके बाद, इसके डंगल को अलग-अलग कर छोटे-छोटे टुकड़े बनाए जाते हैं। इन टुकड़ों को खुले बड़े बर्तन में राख या साबुन के घोल में काफी देर तक उबाला जाता है। इसके बाद इसे डंडे से काफी देर तक पीटने के बाद रेशा अलग-अलग होने लगता है, जिसे निकाला जाता है। इस रेशा को धागा का रूप दिया जाता है। अगर, इस रेशा से जैकेट या अन्य पहनने के उत्पाद बनाने होते है, तो उसमें ऊन को भी मिलाया जाता है। बाजार में नेटल फाइबर जैकेट की 2500 से 3000 रुपये तक है।
कंडाली की चाय से कमाई
पौड़ी जिले में कंडाली चाय तैयार की जा रही है। इससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिकी मजबूत हो रही है। परियोजना निदेशक डीआरडीए संजीव कुमार राय ने बताया कि विकास खंड पाबौ व द्वारीखाल में एनआरएलएम के दो समूह कंडाली से चाय बना रहे हैं। जिसके उत्पादन से समूह माह में 10 हजार से अधिक की आय कमा रहे हैं। कहा, कंडाली के अन्य उपयोगों को लेकर भी समूहों को जल्द ही प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा।