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उत्तराखंड: वन विभाग को पता ही नहीं प्रदेश में बचे हैं कितने गिद्ध, यह शिक्षक दिखा रहे सिस्टम को आईना

Mon, 07 Mar 2022 01:18 PM IST
रेनू सकलानी विनोद मुसान, अमर उजाला, हरिद्वार

सार

वर्ष 2005 के बाद अभी तक गिद्धों की गणना नहीं हुई है। वन विभाग गिद्धों के संरक्षण को लेकर उदासीन बना हुआ है, तो वहीं पौड़ी के एक शिक्षक अपने वेतन का एक हिस्सा गिद्ध संरक्षण के लिए खर्च कर सिस्टम को आईना दिखा रहे हैं। 
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शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मृत पशुओं के अवशेषों को खाकर अपना भोजन प्राप्त कर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने वाले प्रकृति के सफाईकर्मी गिद्धों का जीवन संकट में है। उत्तराखंड में तो इनकी स्थिति और भी खराब है। इनके संरक्षण का जिम्मा वन विभाग के पास है, लेकिन विभाग को पता ही नहीं है कि राज्य में गिद्धों की संख्या कितनी है। 

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वन विभाग की वेबसाइट और वर्षवार अपडेट होने वाली सांख्यिकी बुक में गिद्धों की संख्या का आज भी वर्ष 2005 का डाटा दर्शाया गया है। वर्ष 2005 की गणना के अनुसार संरक्षित क्षेत्रों में गिद्धों की संख्या 1272 और संरक्षित क्षेत्रों के बाहर 3794 कुल 5066 थी।

अन्य प्रजातियों के जानवरों की गणना भी वर्षों से नहीं हुई

खास बात यह है कि वन विभाग की सांख्यिकी बुक में वर्ष 2008 में भी इनकी संख्या इतनी ही दर्शायी गई है। जबकि इसके बाद का डेटा ही अपडेट नहीं है। मतलब साफ है वन विभाग को इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है कि वर्तमान में राज्य में गिद्धों की संख्या कितनी है। इसके अलावा तमाम कई अन्य प्रजातियों के जानवरों की गणना भी वर्षों से नहीं हुई है। 

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केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार प्रदेश में वन्यजीवों की गणना समय-समय पर की जाती है। गिद्धों की गणना कब से नहीं हुई है, इसकी जानकारी नहीं है। बंदर-लंगूर, हिम तेंदुए और कुछ अन्य वन्यजीवों की गणना की गई है, जिसके आंकड़े एक सप्ताह के भीतर जारी किए जाएंगे। 
- डॉ. पराग मधुकर धकाते, मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक

राजाजी को घोषित किया गया नो डाइक्लोफिनिक जोन 
वर्ष 2016 में गिद्धों को बचाने के लिए राजाजी नेशनल पार्क टाइगर रिजर्व को ‘नो डाइक्लोफिनिक जोन’ घोषित किया गया था। इसके साथ ही पशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाली दर्दनाशक दवा डाइक्लोफिनिक के दून में नियंत्रित प्रयोग की कार्ययोजना बनाई गई थी। डाइक्लोफिनिक से गिद्धों के गुर्दे फेल हो जाते हैं। इससे यूपी समेत कई प्रदेशों से गिद्ध विलुप्त हो गए हैं। अब इस योजना का आगे क्या हुआ, विभागीय अधिकारियों को इसकी भी कोई जानकारी नहीं है। 

वर्ष 2005 से जुटे हैं गिद्धों को बचाने की मुहिम में शिक्षक दिनेश कुकरेती

एक तरफ जहां वन विभाग गिद्धों के संरक्षण को लेकर उदासीन बना हुआ है, वहीं शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती गिद्ध बचाओ अभियान वर्षों से आगे बढ़ा रहे हैं। कुकरेती वर्ष 2005 से इस मुहिम में जुटे हैं। वह अपने वेतन का एक हिस्सा गिद्ध संरक्षण के कार्य में खर्च करते हैं। जबकि वन विभाग की ओर से आज तक उन्हें कोई मदद नहीं मिली। 

राजकीय इंटर कॉलेज द्वारीपैनो, रिखणीखाल, पौड़ी गढ़वाल में तैनान शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1997 में गौरेया बचाव मुहिम शुरू की थी। इसके तहत उन्होंने अब तक हजारों घोसले (लकड़ी के बाक्स) बनाकर लोगों को बांट चुके हैं। सौ से ज्यादा घोंसले तो उनके घर पर ही लगे हैं। इसके बाद वर्ष 2013 से उन्होंने गैरेया दिवस मनाने की शुरुआत की।

गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को गिद्ध बचाने की देते हैं जानकारी
वर्ष 2005 में एक घटना से उनका ध्यान गिद्धों की ओर खिंचा। इसके बाद उन्होंने गिद्ध बचाव अभियान को भी अपनी मुहिम का हिस्सा बना लिया। उनके प्रयासों से रिखणीखाल ब्लाक की पहाड़ियां आज गिद्ध संरक्षण केंद्र के रूप में उबरकर सामने आई हैं। यहां लगातार गिद्धों की संख्या बढ़ रही है। वह गोष्ठियों के माध्यम से लोगों को गिद्ध बचाव की जानकारी देते हैं।

उनके अनुसार, आज रखणीखाल और नैनीडांडा ब्लाक के 60 से अधिक गांव उनकी इस मुहिम के साथ जुड़ चुके हैं। इस काम में ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों, वन पंचायत के प्रधानों, पूर्व प्रधानों, महिला व युवक मंगल दलों का उन्हें भरपूर साथ मिला है, लेकिन वन विभाग की ओर से आज तक उन्हें कोई मदद नहीं पहुंचाई गई। विभाग का रवैया देखकर वह खुद मदद नहीं मांगते हैं। अपने वेतन का एक हिस्सा वह इस काम में खर्च करते हैं। 

कुकरेती बताते हैं उत्तराखंड में गिद्धों के वास स्थल लगातार घट रहे हैं। वर्ष 1980 के दशक में उत्तराखंड में इनके तीन सौ के करीब वासस्थल थे, जो अब घटकर दस के करीब रह गए हैं। भोजन की कमी और कीटनाशकों का प्रयोग इनके जीवन के लिए संकट बन गया है। अब उत्तराखंड में गिद्धों की प्रमुख तौर पर चार ही प्रजातियां दिखाई देती हैं।
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उत्तराखंड में पाई जाने वाली गिद्धों की प्रजातियां

-चमर गिद्ध : मैदान व पहाड़ दोनों इसके वासस्थल हैं। यह प्रजाति आबादी के आसपास भी मिलती है। 
-सफेद गिद्ध : उत्तराखंड में पर्याप्त मात्रा में मिलने वाली यह प्रजाति भी बस्तियों के आसपास रहती है।
-राज गिद्ध : नुकीले पंखों वाला यह गिद्ध हिमालय में 2500 मीटर तक दिखता है। वृक्षदार पहाडियों पर भी इसका वासस्थल है।
-काला गिद्ध : यह अन्य प्रजातियों से आकार में बड़े होते हैं। तीन हजार मीटर में खुले स्थानों पर मिलते हैं।
-हिमालय गिद्ध : शरीर व पूंछ बड़ी होती है। छह सौ मीटर की ऊंचाई पर मिलते हैं।
-यूरेशियाई गिद्ध : देशी गिद्ध से बड़े होते हैं। खुले मैदान वाले क्षेत्र में 910 मीटर ऊंचाई पर मिलने वाली प्रजाति गर्मियों में तीन हजार मीटर तक पहुंच जाती है।
-जटायु गिद्ध : इसमें मांस के बड़े टुकड़ों को ऊंचाई से गिराकर उसकी हड्डी तोड़ने की आदत होती है। 1500 मीटर की ऊंचाई में मिलने वाली प्रजाति नुकीले पंखे व फनकार पूंछ वाली होती है।
-पतली चोंच गिद्ध : अन्य देसी गिद्धों की अपेक्षा चोंच, सिर व ग्रीवा अधिक पतली होती है। विश्व स्तर पर संकटग्रस्त प्रजाति खुले वनों में 1500 मीटर ऊंचाई पर दिखती है।

विलुप्त होने के यह भी कारण 
- वासस्थलों में कमी
- वन क्षेत्र व आबादी में बड़े व ऊंचे पेड़ों की कमी
- गिद्धों की सीमित प्रजनन क्षमता
- जानवरों में दवा का प्रयोग बढ़ना
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