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उत्तराखंड चुनाव 2022: सीटें और पार्टियां बदलीं पर बढ़ता रहा यशपाल का ‘यश’, कई अहम विभागों के रहे मंत्री

Tue, 12 Oct 2021 12:08 PM IST
अलका त्यागी गिरीश रंजन तिवारी, अमर उजाला, नैनीताल

सार

Uttarakhand Election 2022: 1977 के आम चुनाव में यशपाल कांग्रेस के दिग्गज नेता एनडी तिवारी के गृह क्षेत्र नैनीताल के देवलचौर गांव में एक केंद्र में कांग्रेस के बूथ एजेंट बने थे।
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यशपाल आर्य - फोटो : फाइल फोटो
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विस्तार
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वर्ष 1977 में एक मतदान केंद्र में चुनाव एजेंट से राजनीति का ककहरा सीखने वाले यशपाल आर्य देखते ही देखते राजनीति के पुराने खिलाड़ियों को भी राजनीति का पाठ पढ़ाने और सरकार बनाने-गिराने तक में सक्षम बन कर उभरे। यशपाल निर्विवाद रूप से उत्तराखंड के प्रमुख दलित नेता हैं। राज्य में उनके समर्थकों की संख्या काफी बड़ी है और दलित समाज पर खास पकड़ भी है।

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वेकई सीटों का चुनावी गणित साधने में सक्षम हैं। यही वजह है कि वह उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से हर चुनाव में विजयी रहे जबकि उन्होंने पहाड़ और तराई की अलग सीटों और कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों से चुनाव लड़े। 2017 में राजनीति में नए आए उनके पुत्र संजीव की जीत में भी उनका वरद हस्त रहा। 

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इससे पहले 1977 के आम चुनाव में यशपाल कांग्रेस के दिग्गज नेता एनडी तिवारी के गृह क्षेत्र नैनीताल के देवलचौर गांव में एक केंद्र में कांग्रेस के बूथ एजेंट बने थे। तब इमरजेंसी के बाद कांग्रेस विरोधी लहर थी लेकिन तिवारी को देवलचौर केंद्र से सर्वाधिक वोट मिले। तभी उनकी पहली मुलाकात तिवारी से हुई। तिवारी ने ही यशपाल का राजनीतिक कैरियर गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यशपाल हमेशा इस बात को सार्वजनिक रूप से स्वीकारते भी रहे हैं। 1984 में यशपाल अपने गांव में ग्राम प्रधान चुने गए और इसके बाद उनका कैरियर बहुत तेजी से बढ़ा।

उन्हें नैनीताल का  जिला युवा कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 1989 में यशपाल खटीमा निर्वाचन क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। 1991 के चुनाव में  उन्हें हर का सामना करना पड़ा लेकिन 1993 में वे पुन: जीत कर लौटे। 1996 में उन्हें फिर खटीमा से हार का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद के किसी भी चुनाव में उन्हें हार का मुंह नहीं देखना पड़ा।

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पराजित भी हुए और जीते भी

विभिन्न चुनावों में उनका मुकाबला श्रीचंद, सुरेश राम, लाखन सिंह से होता रहा। लाखन और सुरेश से वे पराजित भी हुए और जीते भी। उत्तराखंड बनने के बाद से वे हर चुनाव में अविजित ही रहे। इस राज्य में वह एक बड़े नेता के रूप में उभरे और 2012 में मुख्यमंत्री पद के सशक्त दावेदार बने। तब उनके मुख्यमंत्री बनने की बहुत संभावना थी लेकिन अंतिम समय में विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया गया। 

वर्ष 2002 और 2007 में वे आरक्षित सीट मुक्तेश्वर और 2012 में वे बाजपुर से कांग्रेस के टिकट पर विधायक बने। 2017 में चुनाव से ठीक पहले भाजपा में शामिल होने के बाद वे बाजपुर से दोबारा विधायक चुने गए। कुल पांच बार विधायक रहे आर्य उत्तराखंड में एक बड़े दलित नेता के रूप में स्थापित हैं। वर्ष 2007 से 2014 तक यशपाल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे।

विधानसभा अध्यक्ष सहित तमाम अहम विभागों के रहे मंत्री
यशपाल आर्य को उत्तराखंड में तमाम महत्वपूर्ण दायित्व मिले हैं। वर्ष 2002 में राज्य की प्रथम निर्वाचित सरकार के दौर में एनडी तिवारी ने अपने चहेते यशपाल को विधानसभा अध्यक्ष बनवाया। 2012 में कांग्रेस के पुन: सत्ता में आने पर विजय बहुगुणा सरकार में उन्हें सिंचाई, राजस्व और तकनीकी शिक्षा विभाग मिले। 2017 में भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा सरकार में वे परिवहन, समाज कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण और आबकारी विभागों के मंत्री रहे।  
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