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उत्तराखंड सत्ता-संग्राम 2022: कांग्रेस के गढ़ रहे कुमाऊं में राम लहर ने कराई भाजपा की एंट्री 

Mon, 29 Nov 2021 06:56 PM IST
अलका त्यागी अभिषेक सिंह, अमर उजाला, हल्द्वानी

सार

Uttarakhand Election 2022: वर्ष 1990 में राम लहर पर सवार होकर लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से सितंबर में अपनी रथयात्रा शुरू की तो भाजपा को अंदाजा नहीं था कि वह 1991 विधानसभा चुनावों में चमत्कारिक रूप से जीत दर्ज करेगी।
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बीजेपी - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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विस्तार
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आजादी के बाद हुए चुनाव से लेकर उत्तराखंड बनने तक 1977 का चुनाव छोड़ दिया जाए तो कुमाऊं में कांग्रेस का ही परचम लहराता रहा। हालांकि इस दौरान निर्दलीय और वाम दलों ने जरूर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई लेकिन कांग्रेस का कुमाऊं में बना वर्चस्व कम नहीं हुआ। वर्ष 1990 में राम लहर पर सवार होकर लालकृष्ण आडवाणी ने जब सोमनाथ से सितंबर में अपनी रथयात्रा शुरू की तो भाजपा को अंदाजा नहीं था कि वह 1991 विधानसभा चुनावों में चमत्कारिक रूप से जीत दर्ज करेगी। कुमाऊं की नौ सीटों में भाजपा ने सात सीटें जीतीं। नारायण दत्त तिवारी समेत कांग्रेस को दो ही विधायक मिले। 

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मंडल कमीशन के विरोध और राममंदिर आंदोलन के पक्ष में बने माहौल का असर रहा कि 1996 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कुमाऊं में अपनी पकड़ और मजबूत करते हुए नौ सीटों में से आठ सीटों पर जीत दर्ज की। यशपाल आर्य, गोविंद सिंह कुंजवाल जैसे कांग्रेस के दिग्गजों को भी हार नसीब हुई। वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड अलग राज्य बन गया। नित्यानंद स्वामी पहले मुख्यमंत्री बनाए गए।
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2002 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को जीत हासिल हुई। अलग राज्य बनने और नए सिरे से हुए परिसीमन के बाद कुमाऊं में विधानसभा सीटें बढ़कर नौ से 29 हो गईं, जिनमें कांग्रेस 15, भाजपा सात, उक्रांद  तीन,  बसपा दो और एक सीट पर निर्दलीय काबिज हुआ। माना जा रहा था कि हरीश रावत मुख्यमंत्री बनेंगे लेकिन हाईकमान ने सभी को चौंकाते हुए खांटी राजनीतिज्ञ एनडी तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी। तभी से कांग्रेस में भीतरखाने जो सियासत शुरू हुई वह आजतक जारी है।

इसी खींचतान और सभी को लालबत्ती बांटकर संतुष्ट करने का नतीजा रहा कि 2007 के चुनावों में भाजपा की फिर से एंट्री हुई। कांग्रेस की तरह भाजपा हाईकमान ने भी मुख्यमंत्री की कुर्सी विधायकों के बजाय सांसद भुवन चंद्र खंडूरी को सौंपी।

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भाजपा ने भ्रष्टाचार का मुद्दा छेड़ा तो पार्टी के भीतर भी बगावत का बिगुल बज उठा

भाजपा का यह कार्यकाल मुख्यमंत्री बदलने के लिए याद किया जाएगा। पहले खंडूरी फिर रमेश पोखरियाल निशंक और अंत में भुवन चंद्र खंडूरी। यही वजह रही कि 2012 के चुनावों में कांग्रेस की वापसी हुई लेकिन बहुमत चार सीट दूर था। ऐसे में बसपा, निर्दलीय और उक्रांद (पी) कांग्रेस के काम आए। इस चुनाव में भी हरीश रावत ने जमकर मेहनत की लेकिन हाईकमान ने उनकी जगह यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी कर दी। यह बात हरीश रावत समर्थकों को नागवार गुजरी लेकिन हाईकमान के आगे मनमसोस कर रहना पड़ा। 

2013 की आपदा के बाद विजय बहुगुणा के खिलाफ भाजपा ने भ्रष्टाचार का मुद्दा छेड़ा तो पार्टी के भीतर भी बगावत का बिगुल बज उठा और अंत में हाईकमान को हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। 2017 का विधानसभा चुनाव आने से पहले 2016 में कांग्रेस में बगावत इतनी चरम पर पहुंची कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बड़े क्षत्रपों के साथ कांग्रेस पार्टी को ही तिलांजलि दे दी। मामला राष्ट्रपति शासन तक पहुंच गया अंत में कोर्ट के हस्ताक्षेप से हरीश रावत फिर मुख्यमंत्री बने लेकिन दिग्गजों के जाने से पार्टी की कमजोरी जग जाहिर हो चुकी थी। यही वजह रही कि 2017 के चुनावों में मोदी लहर के आगे कांग्रेस की कमजोर नाव को हरीश रावत जैसा मांझी भी पार नहीं लगा सका। 2017 में कांग्रेस कुमाऊं में महज पांच सीटों जबकि प्रदेश में कुल 11 सीटों पर सिमटकर रह गई। 

हरीश रावत दो सीटों पर जब हारे 
चुनावी जानकारों को मानना है कि 2017 के चुनाव में हरीश रावत खुद कहीं न कहीं अपनी जीत को लेकर सशंकित थे यही वजह रही कि उन्होंने किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ा लेकिन दोनों ही जगह उन्हें हार मिली। हालांकि कुछ लोगों का मत है कि दोनों जगह से चुनाव लड़ने के पीछे उनकी मंशा आसपास की सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाना था लेकिन उनका यह दांव फेल साबित हुआ। तराई में कांग्रेस के आदेश चौहान ही जीत दर्ज कर सके। हालांकि तराई में कांग्रेस को इतना नुकसान नहीं हुआ क्योंकि 2012 के चुनाव में यहां भाजपा ने नौ में सात सीटों में जीत दर्ज की थी। 
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