भाजपा का यह कार्यकाल मुख्यमंत्री बदलने के लिए याद किया जाएगा। पहले खंडूरी फिर रमेश पोखरियाल निशंक और अंत में भुवन चंद्र खंडूरी। यही वजह रही कि 2012 के चुनावों में कांग्रेस की वापसी हुई लेकिन बहुमत चार सीट दूर था। ऐसे में बसपा, निर्दलीय और उक्रांद (पी) कांग्रेस के काम आए। इस चुनाव में भी हरीश रावत ने जमकर मेहनत की लेकिन हाईकमान ने उनकी जगह यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी कर दी। यह बात हरीश रावत समर्थकों को नागवार गुजरी लेकिन हाईकमान के आगे मनमसोस कर रहना पड़ा।
2013 की आपदा के बाद विजय बहुगुणा के खिलाफ भाजपा ने भ्रष्टाचार का मुद्दा छेड़ा तो पार्टी के भीतर भी बगावत का बिगुल बज उठा और अंत में हाईकमान को हरीश रावत को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। 2017 का विधानसभा चुनाव आने से पहले 2016 में कांग्रेस में बगावत इतनी चरम पर पहुंची कि पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बड़े क्षत्रपों के साथ कांग्रेस पार्टी को ही तिलांजलि दे दी। मामला राष्ट्रपति शासन तक पहुंच गया अंत में कोर्ट के हस्ताक्षेप से हरीश रावत फिर मुख्यमंत्री बने लेकिन दिग्गजों के जाने से पार्टी की कमजोरी जग जाहिर हो चुकी थी। यही वजह रही कि 2017 के चुनावों में मोदी लहर के आगे कांग्रेस की कमजोर नाव को हरीश रावत जैसा मांझी भी पार नहीं लगा सका। 2017 में कांग्रेस कुमाऊं में महज पांच सीटों जबकि प्रदेश में कुल 11 सीटों पर सिमटकर रह गई।
हरीश रावत दो सीटों पर जब हारे
चुनावी जानकारों को मानना है कि 2017 के चुनाव में हरीश रावत खुद कहीं न कहीं अपनी जीत को लेकर सशंकित थे यही वजह रही कि उन्होंने किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण से चुनाव लड़ा लेकिन दोनों ही जगह उन्हें हार मिली। हालांकि कुछ लोगों का मत है कि दोनों जगह से चुनाव लड़ने के पीछे उनकी मंशा आसपास की सीटों पर कांग्रेस को जीत दिलाना था लेकिन उनका यह दांव फेल साबित हुआ। तराई में कांग्रेस के आदेश चौहान ही जीत दर्ज कर सके। हालांकि तराई में कांग्रेस को इतना नुकसान नहीं हुआ क्योंकि 2012 के चुनाव में यहां भाजपा ने नौ में सात सीटों में जीत दर्ज की थी।