प्रदेश में पिछले दस साल से नए जिलों के गठन को लेकर भाजपा-कांग्रेस घोषणाएं करती आई है। सबसे पहले स्वतंत्रता दिवस पर 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने चार नए जिलों के गठन की घोषणा की। तब यमुनोत्री, कोटद्वार, रानीखेत व डीडीहाट को नए जिले बनाने की घोषणा की गई, लेकिन फिर निशंक मुख्यमंत्री पद से हट गए और भुवन चंद्र खंडूड़ी दोबारा मुख्यमंत्री बने।
नए जिलों के गठन का शासनादेश भी हुआ लेकिन 2012 में कांग्रेस के सत्ता में आने पर मसला लटक गया। कांग्रेस की सरकार में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के करीब दो साल के कार्यकाल में कोई प्रगति नहीं हुई। इसके बाद आए हरीश रावत ने चुनाव से ठीक पहले नए जिलों के गठन का इरादा जाहिर किया।
चार से आगे बढ़कर उन्होंने एक साथ नौ जिले बनाने की बात कही, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हालांकि नए जिलों के गठन को लेकर राज्य सरकार ने एक आयोग बना दिया। अब केजरीवाल ने सरकार बनने पर छह नए जिलों के गठन का ऐलान किया है, जिससे भाजपा, कांग्रेस व अन्य दलों के सामने एक और दबाव बढ़ गया है। माना जा रहा है कि एक गारंटी और एक घोषणा से केजरीवाल आप की चुनावी बिसात को उत्तराखंड में और पुख्ता कर गए।