उत्तराखंड में बीते साल 16-17 जून को आई आपदा के बाद पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर निर्मित झीलों से पैदा हो सकने वाले खतरों पर चिंता शुरू हो गई है।
भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण (जीएसआई) ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से बनने वाली झीलों की मैपिंग शुरू कर दी है। मकसद सेटेलाइट इमेजरी के जरिए ऐसी झीलों की इनवेंट्री तैयार करना है। पहले चरण में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को प्राथमिकता पर रखा गया है।
केंद्र की तरफ से फंड
रिमोट सेंसिंग के मार्फत होने वाली मैपिंग के जरिए ग्लेशियर से बनी झीलों से जुड़े ऐसे हाई रिस्क एरिया को चिन्हित किया जाएगा, जो भविष्य में मानव जीवन, निर्माण और अन्य पक्षों के लिए खतरे का सबब बन सकते हैं। इस काम के लिए केंद्र की तरफ से फंड मुहैया कराया जा रहा है।
उत्तराखंड की मैपिंग को शुरुआती चरण में दो साल के लिए यानी 2016 तक किया जाएगा। भू-तकनीकी स्थायित्व का पता लगाया जाएगा। इसके पश्चात अन्य हिमालयी राज्यों हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, जम्मू, कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश का काम हाथ में लिया जाएगा।
भारतीय भूगर्भ सर्वेक्षण की तरफ से यह काम शुरू हो गया है। ग्लेशियर से बनी झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ (जीएलओएफ) को देखते हुए यह कार्य बेहद महत्वपूर्ण है।
-सुबोध शर्मा, हेड-नार्दर्न रीजन, जीएसआई।
गपांग गथ की पूरी की फील्ड मैपिंग
अभी तक जीएसआई ने एक ही खतरनाक मानी जाने वाली झील गपांग गथ ग्लेशियर झील की फील्ड रिस्क मैपिंग का काम पूरा किया है। इसकी वजह से मनाली-लेह नेशनल हाइवे समेत नीचे की तरफ सिस्सू गांव को खतरा बना हुआ है। हिमाचल के मुख्य सचिव को भी सुझावों की एक कापी भेजी गई है। जीएसआई हर साल इसकी मानिटरिंग का काम भी करेगा।