उत्तराखंड के कुछ विकलांग खिलाड़ी लोगों के लिए मिसाल साबित हुए हैं। कुदरत ने भले ही उनके साथ नाइंसाफी की, लेकिन उन्होंने इस कमजोरी को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया।
आइए विकलांगता दिवस पर आपको रूबरू कराते हैं ऐसे ही जीवट और जुनूनी खिलाड़ियों से....
युवा शूटरों के लिए प्रेरणास्रोत हैं अनिल कवि
आर्यन स्कूल में युवा खिलाड़ियों को शूटिंग की बारीकियां सिखाते 35 साल के अनिल कवि को देखकर पहली नजर में कोई उनके संघर्ष और हुनर को नहीं आंक सकता। पोलियो के कारण सिर्फ 11 माह की उम्र में उनके दोनों पैर खराब हो गए थे।
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लेकिन वे कुदरत की इस नाइंसाफी से हारे नहीं। मूल रूप से टिहरी के खैराड़ गांव निवासी अनिल कवि आज राष्ट्रीय स्तर के माने हुए निशानेबाज हैं। डीएवी कालेज से ग्रेजुएशन कर चुके अनिल के शूटिंग कैरियर की शुरुआत महज इत्तफाक से हुई है।
अनिल ने बताया कि 1995-96 के दौरान पूर्व खेल मंत्री नारायण सिंह राणा उन्हें अपने साथ दिल्ली ले गए। उन्हें जसपाल राणा शूटिंग एकेडमी में बतौर अकाउंटेंट नौकरी मिली। बच्चों को निशाना लगाते देख उन्होंने भी शौकिया तौर पर शूटिंग शुरू कर दी।
इसी दौरान नारायण सिंह राणा ने उनके भीतर छिपे निशानेबाज को पहचान लिया और फिर उनकी ट्रेनिंग हुई। साल 2002 में चंडीगढ़ में नॉर्दन इंडिया शूटिंग चैंपियनशिप में 10 मीटर एयर पिस्टल में पहला गोल्ड मेडल जीतने के बाद अनिल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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तब से अनिल करीब 27 टूर्नामेंट में 18 स्वर्ण सहित 54 पदक जीत चुके हैं। इसी साल दिल्ली में हुई मास्टर मीट में भी उन्होंने गोल्ड जीता था। जाखन के भगवंतपुर गांव में रह रहे अनिल ने बताया कि उनके पिता ने उनको दूध बेचकर पढ़ाया है, तो मां ने रात-रात जागकर उनके पैरों की मालिश की।
उन्हीं की मेहनत है कि आज वे इस मुकाम पर हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का सपना पूरा नहीं हो सका। उन्होंने बताया कि 2007 में मलेशिया में हुए शूटिंग टूर्नामेंट में वे आर्थिक तंगी के कारण नहीं जा सके। उनकी पत्नी पूनम कवि भी विकलांग श्रेणी की राष्ट्रीय शूटर हैं।
पहली हैंडीकैप महिला शूटर बनीं दिलराज
पेशे से वकील दिलराज कौर उत्तराखंड की पहली विकलांग शूटर हैं। वे अंतरराष्ट्रीय स्तर एक स्वर्ण और एक रजत पदक जीत चुकी हैं। हाथीबड़कला निवासी दिलराज के पैर पोलियो के कारण पैदाइशी कमजोर हैं, लेकिन शूटिंग रेंज में उनका अचूक निशाना उनकी पहचान है।
करीब 10 साल पहले ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान उनके अंकल ने शूटिंग के लिए प्रेरित किया था। 2004 में तीसरी उत्तरांचल स्टेट शूटिंग चैंपियनशिप में 10 मीटर एयर पिस्टल का स्वर्ण पदक जीतने के साथ दिलराज के कॅरियर की शुरुआत हुई।
2005 में नॉर्थ जोन में पदक जीतने के बाद शूटिंग उनके लिए जुनून बन गई। राष्ट्रीय स्तर पर खेले 24 टूर्नामेंटों में 22 स्वर्ण, एक रजत व एक कांस्य पदक दिलराज के खाते में है। इसी साल नार्दन इंडिया शूटिंग चैंपियनशिप में दिलराज ने स्वर्ण पदक जीता है।
मगर सरकारी उपेक्षा से वे भी अछूती नहीं हैं। हालांकि बीते साल खेल मंत्री उनको एक पिस्टल दे चुके हैं, लेकिन आर्थिक सहायता के नाम पर उनको कुछ नहीं मिल पाया।
बैडमिंटन में बनाया प्रेम कुमार ने मुकाम
यूं तो बैडमिंटन का खेल दौड़-भाग का है, जिसमें खिलाड़ी की फिटनेस और स्टेमिना ही जीत का आधार बनता है। लेकिन, सेवलाकलां गांव के प्रेमकुमार ने इस खेल में अलग पहचान बनाई है।
करीब डेढ़ साल की उम्र में पोलियो के कारण अपना दायां पैर गवां चुके प्रेम ने 2004 से बैडमिंटन खेलना शुरू किया।
2005 में राष्ट्रीय स्तर पर विकलांग श्रेणी में पहला पदक जीतने के बाद प्रेम कुमार अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर 7 और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 3 पदक जीत चुके हैं। बैडमिंटन के साथ ही प्रेम कुमार लंबी दूरी की तैराकी करने में भी माहिर हैं।
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