1993 में मैंने पढ़ा कि उत्तराखंड में राज्य अलग राज्य निर्माण के लिए आंदोलन चल रहा है। तब पौड़ी में पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया। मैं भी अपनी जन्मभूमि में चल रहे इस आंदोलन में शामिल होना चाहती थी। मेरे पति ओएनजीसी में कार्यरत थे और तब हम लोग गोवा में रहते थे। मैं म्यूजिक लेक्चरर के तौर पर काम करती थी। उसी दौरान मेरे पति का देहरादून तबादला हो गया और हम दून आ गए।
उस समय राज्य आंदोलन जोरों पर था। मेरी मां ने मुझे भी आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। मैंने आसपास की कॉलोनियों में जाकर लोगों को जोड़ना शुरू किया। पहली बार मुझे पहचान तब मिली, जब हमने दो दिन के लिए ओएनजीसी को पूरी तरह बंद कर दिया और तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पुतले फूंके। इससे लखनऊ और दिल्ली तक हलचल मच गई। मुझे गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि कुछ देर बाद रिहा भी कर दिया।
वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी कौशल्या डबराल ने मुझे सक्रिय रूप से हिस्सा लेने को कहा। इसी बीच दो अक्तूबर को आंदोलनकारियों ने दिल्ली जाने का फैसला लिया। भजन कीर्तन करते हुए हम लोग बसों से दिल्ली के लिए रवाना हुए। रामपुर तिराहा पहुंचे तो वहां आसपास चीख-पुकार मची हुई थी। बताया कि पुलिस ने आंदोलनकारियों के साथ बेहद अमानवीय बर्ताव किया है। मैं महिला आंदोलनकारी साथी के साथ बस से नीचे उतर आई और आसपास देखने लगी।
इसी दौरान मुझे खेत में महिलाओं की साड़ियां दिखी। तभी कोई मशाल लेकर बसों में आग लगाने के लिए दौड़ता हुआ दिखा। हम दोनों ने उसको रोका और किसी तरह उसके हाथ से मशाल छीन ली। मैंने दांतों से उसे काट भी लिया। वह मशाल छोड़कर भाग गया। हमें खेतों में दो महिलाएं मिली, जिनके साथ बर्बरता की गई थी। हम उन्हें अपने साथ बस में ले आए।
वहां से आगे बढ़े तो मुजफ्फरनगर से कुछ पहले एक बार फिर गाड़ियां रोक दी गईं। आंदोलनकारियों ने धरना और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। पुलिस आंदोलन को कुचलने पर आमादा थी। उन्होंने पहले रबर की गोलियां चलाई और अचानक गोलियां चलने लगी। कई आंदोलनकारी घायल हो गए और कुछ की मौत भी हो गई। कुछ आंदोलनकारियों का आज तक पता नहीं चल पाया है।
- उषा नेगी, वरिष्ठ राज्य आंदोलनकारी व अध्यक्ष, राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयो
दो अक्तूबर की उस भयानक सुबह की यादें आज भी हर आंदोलनकारी के जेहन में ताजा है। एक अक्तूबर की रात करीब डेढ़ सौ गाड़ियों के काफिले में आंदोलनकारी दिल्ली के लिए रवाना हुए। इस दौरान मोहंड में पुलिस ने बैरिकेडिंग कर हमें रोक लिया। यहां पुलिस कम थी और आंदोलनकारी ज्यादा। इसलिए आंदोलनकारी चकमा देकर आगे निकलने में कामयाब हो गए। गुरुकुल कांगड़ी के पास एक बार फिर बैरिकेडिंग कर बसों को रोक लिया गया।
पुलिस ने हमें फंसाने के लिए खुद ही कई दुकानों को आग लगा दी। आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच झड़प हो गई, जिसके बाद पुलिस ने गोली चला दी। पहली गोली आंदोलनकारी रविंद्र सोलांकी को लगी। आंदोलनकारियों का कारवां सुबह रामपुर तिराहा पहुंचा। उस पूरे इलाके को बैरिकेडिंग कर छावनी बना दिया था। चप्पे-चप्पे पर पुलिस तैनात थी।
जब हम पहुंचे तो बताया गया कि दिल्ली के लिए सबसे पहले रवाना हुई चमोली की बसों के आंदोलनकारियों के साथ पुलिस ने अमानवीयता की है। इसके विरोध में हम भी बैरिकेडिंग की तरफ बढ़े और सरकार के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। दूसरी तरफ से पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। गोलीकांड में हमारे सात आंदोलनकारियों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया, जबकि बड़ी संख्या में घायल हो गए।
कई आंदोलनकारियों ने आसपास के गांव में छुप कर जान बचाई। स्थानीय लोग हमारे लिए देवदूत बनकर आए। उन्होंने भूखे-प्यासे आंदोलनकारियों को न सिर्फ खाने को भोजन दिया, बल्कि उनको सुरक्षित रूप से ठहराने की व्यवस्था भी की। सुबह उस पूरे इलाके में मंजर एकदम बदला हुआ था। चारों तरफ पुलिस ही पुलिस दिख रही थी।
- जगमोहन सिंह नेगी, अध्यक्ष, चिन्हित राज्य आंदोलनकारी मंच