बदरीनाथ धाम करोड़ों हिंदुओं की अटूट आस्था का केंद्र है। यहां ग्रीष्मकाल में छह माह तक देश-विदेश के तीर्थयात्री भगवान बदरीविशाल के दर्शनों को आते हैं।
बाकी छह माह शीतकाल में साधु-संत चारों ओर बर्फ से ढके बदरीनाथ धाम में साधना रत रहते हैं। वर्तमान में यहां आठ साधु-संत विभिन्न स्थलों पर बर्फ के साम्राज्य में साधना रत हैं। साधु-संतों की इस अटूट आस्था को देख हर कोई स्तब्ध है।
2004 में बदरीधाम पहुंचे थे अमृतानंद
बदरीनाथ मंदिर के पश्च भाग में नीलकंठ पर्वत की तलहटी पर इन दिनों बर्फानी बाबा के नाम से प्रसिद्ध अमृतानंद जी महाराज बर्फ के ऊपर बैठकर साधना में लीन हैं। अमृतानंद दिनभर में एक बार भोजन ग्रहण करते हैं।
उनके शिष्य भोले नंद बताते हैं कि अमृतानंद पिछले नौ सालों से बदरीनाथ धाम में साधना रत हैं। वर्ष 2004 में वे अपने गुरू महाराज शिवनाथ गिरी जी के साथ बदरीकाश्रम पहुंचे थे।
उन्हें यह स्थान इतना भाया कि अपना पूरा जीवन धाम में बिताने का संकल्प लिया। आज भी वे यहां वर्षभर साधना में लीन रहते हैं।
नैकेनिकल इंजीनियर थे अमृतानंद
यात्राकाल में भोले नंद तीर्थयात्रियों से अमृतानंद के लिए भोजन की व्यवस्था के लिए दान लेते हैं। भोले नंद का कहना है कि अमृतानंद कलकत्ता में मेकेनिकल इंजीनियर थे। वर्ष 2002 में उनकी माता का निधन हो गया। एक वर्ष बाद यानि वर्ष 2003 में उनके पिता का देहावसान भी हो गया।
उन्होंने अन्य भाई-बहिनों को छोड़कर अपने गुरू शिवनाथ गिरी जी के साथ बदरीकाश्रम जाने का निर्णय लिया। तब से वे धाम में साधना में लीन हैं। चारों ओर बर्फ और कड़ाके की ठंड के बीच धाम में आठ साधु-संत साधना में लीन हैं।