राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के बाद प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के अपना प्रत्याशी घोषित करने से राज्य की सियासत में नए समीकरण बनने लगे हैं। अब तक सरकार की ढाल बने पीडीएफ की इस चाल से चार साल के गठबंधन पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
कांग्रेस के टम्टा को मैदान में उतारने के बाद संभावना जताई जा रही थी कि पीडीएफ उनके पक्ष में रोलबैक करेगी, लेकिन हुआ ठीक इसके उलट। पीडीएफ नेता व सरकार में मंत्री दिनेश धनै को आगे करने का फैसला कांग्रेस को तो नुकसान पहुंचा ही रहा है, साथ ही भाजपा के समीकरणों में भी फिट नहीं बैठता। भाजपा पर राज्यसभा में अपना संख्याबल बढ़ाने का दबाव है, जिसके लिए वह पीडीएफ में सेंधमारी की जुगत में थी।
वहीं, कांग्रेस के पास पीडीएफ से वार्ता का विकल्प खुला होना काफी कुछ उसके पक्ष में जा सकता है। मंत्रिमंडल में बसपा को जगह देने की शर्त भी मोल भाव का हिस्सा हो सकता है। दो माह के सियासी घमासान के बाद अब राज्यसभा चुनाव सीएम हरीश रावत की अग्निपरीक्षा बन गया है।
सरकार के बहुमत में होने के बाद अगर राज्यसभा में पटकनी खाते हैं तो उनकी कुर्सी पर सवाल खड़ा हो जाएगा। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, ऐसे में पीडीएफ का एकाएक सीएम हरीश रावत से राज्यसभा सीट की मांग करना कई सवाल खड़े कर रहा है। कांग्रेस आला कमान ने शनिवार को जिन सात राज्यसभा प्रत्याशियों की सूची जारी की उसमें प्रदीप टम्टा को छोड़ शेष सभी केंद्र की राजनीति के बड़े दिग्गज हैं।
भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले
अजय भट्ट
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माना जा रहा था कि इस सियासी चाल से न केवल पैराशूट प्रत्याशी बल्कि भाजपा की पीडीएफ में सेंधमारी की संभावना भी खत्म हो जाएंगी। वहीं दूसरी तरफ भाजपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। राज्यसभा चुनाव में बहुमत की गणित फिलहाल भाजपा के पक्ष में नहीं है, जिससे वह पूरी तरह से पीडीएफ में टूट के भरोसे है।
कांग्रेस के उत्तराखंड से प्रत्याशी बनाने से भाजपा के पास भी सीमित विकल्प हैं। सांसद तरुण विजय के अलावा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए पूर्व सीएम विजय बहुगुणा भी दावेदार हो सकते हैं।
आखिरी अब क्यों मुखर हुई पीडीएफ
पीडीएफ राज्यसभा सीट की दावेदारी तो कर रही है, लेकिन उसके लिए सरकार पर दबाव बनाना इतना आसान नहीं है। माना जा रहा है कि पीडीएफ का एकाएक राज्यसभा के लिए सामने आने के पीछे पहाड़ के नेता को मौका देने के साथ कांग्रेस नेता किशोर उपाध्याय के विरोध में अधिक प्रतीत हो रहा है। कांग्रेस के साथ चार वर्ष से चल रहे गठबंधन को तोड़ने का नुकसान पीडीएफ को भी झेलना पड़ेगा।
ऐसे में एक तरह से फ्रंट की ओर से दबाव की राजनीति है। चार साल में फ्रंट के सामने कई मौके आए, जब वह भाजपा का साथ पकड़ सकता था। दिनेश धनै तो दो वर्ष तक मंत्री नहीं बनाए गए, लेकिन तब भी वह पीडीएफ का हिस्सा रहे। वर्ष 2014 में हरीश रावत के सीएम बनने पर उन्हें कुर्सी मिली।
कांग्रेस से सतपाल महाराज के भाजपा में शामिल होने पर सबसे बड़ा सवाल पीडीएफ पर खड़ा हुआ, लेकिन गठबंधन सरकार पर आंच नहीं आई। अंतिम मौका मार्च 18 के सियासी संकट के दौर का रहा जब पीडीएफ गठबंधन नहीं टूटा। अब राज्यसभा सांसद के चुनाव में उतरने के निर्णय पर सबकी नजर टिकी है।