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तब खून से रंग गई थीं मसूरी की हसीन वादियां

Tue, 03 Sep 2013 04:24 PM IST
अमर उजाला, शूरवीर भंडारी, मसूरी
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दो सितंबर 1994। मसूरी गोलीकांड का खौफनाक मंजर आंखों के सामने आते ही रूह कांप जाती है।
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यादों में झूलाघर के आस-पास पुलिस और पीएसी की मौजूदगी, बारूदी गंध और चारों ओर पसरा सन्नाटा। रात के समय पुलिस के जवानों की बूटों की आवाजें, महिलाओं की चीख पुकार ज्यों की त्यों बसी है। उस समय 15 दिन कर्फ्यू रहा।

तस्वीरों में देखें, मसूरी गोलीकांड का दर्दनाक चेहरा

तत्कालीन सत्ता प्रतिष्ठान के इशारे पर आंदोलनकारियों को घरों से उठाकर बर्बरता से पिटाई की गई। पुलिस ने महिलाओं से भी बदसलूकी की। निहत्थे आंदोलनकारी एकदम असहाय थे।
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मसूरी गोलीकांड का काला दिन
उस दिन हर सुबह की तरह मैं और मेरे पत्रकार साथी बिजेंद्र पुंडीर अनशन स्थल की और धीमे-धीमे चल रहे थे। तब मोबाइल आम नहीं हुआ करते थे।

झूलाघर पहुंचे तो वहां खाकी वर्दीधारी जमा थे। लगभग साढ़े नौ बज रहे थे। आंसू गैस के गोले और अन्य सामग्री सड़क पर ही थी। चाय-पान की दुकानें पुलिस ने बंद करा दी थी। अब जो शहीद स्थल है, उस हॉल में उत्तराखंड संघर्ष समिति का क्रमिक अनशन चल रहा था।

पढ़ें, 'हत्या' करने के बाद मांग रहे सम्मान

पूरे हॉल पर पीएसी कब्जा था। अचानक वहां से पांच आंदोलनकारियों को उठाकर पास ही के थाने में ले जाया गया। तभी सूचना मिली की खटीमा गोलीकांड का विरोध दर्ज कराने पिक्चर पैलेस से कलम सिंह रावत, डीआर कपूर के नेतृत्व में आंदोलनकारी अनशन स्थल की और आ रहे हैं।

हमने तत्कालीन डीजीपी उमाकांत त्रिपाठी से पूछा-आज क्या विशेष है? उमाकांत त्रिपाठी चाय पी रहे थे। बोले, आप अपना काम करो, हमें अपना काम करने दो। खबर लेने आगे जाओ। तभी खटीमा कांड का विरोध कर रहे पालिका कर्मी राजेंद्र शर्मा को पुलिस गिरफ्तार कर ले गई।

अन्य आंदोलनकारियों को गाड़ियों में ठूंस कर देहरादून की और रवाना कर दिया गया।

पहाड़ियों से बरसने लगे पत्थर
हम झूलाघर हार्वर्ड तक पहुंचे थे तभी एक जुलूस लाइब्रेरी की ओर से भी अनशन स्थल बढ़ता दिखाई दिया। 10 मिनट बाद हम झूलाघर पहुंचे तो हिलक्वीन होटल की पहाड़ियों से पत्थर बरसने लगे।

इस बीच पिक्चर पैलेस से आने वाला जूलूस भी झूलाघर पहुंच गया। महिलाएं हॉल की और बढ़ी। मैं झूलाघर से ऊपर पोस्ट ऑफिस की और जाने वाली सड़क पर खड़ा था। पुलिस ने आंसू गैस के गोले फेंकने शुरू कर दिए। इस बीच एक महिल हॉल में घुस गई, जिस पर पीएसी के जवानों ने ताबड़-तोड़ गोलियां बरसा दी।

बेलमती चौहान, हंसा धनाई की मौके पर ही मौत हो गई। यह देख आंदोलनकारी और भड़क गए। पुलिस के एक जवान ने हॉल के बाहर एक खड़े युवा बलबीर पर पहले गोली चलाई और बाद में संगीन घोंप दी। बलवीर सड़क पर ही गिर पड़ा।

सड़क पर खड़े राय सिंह बंगारी, मदनमोहन मंमगई और धनपत भी पुलिस-पीएसी के गोली के शिकार हो गए। बंगारी की अस्पताल ले जाते समय मौत हो गई। तत्कालीन सीओ उमाकांत त्रिपाठी हॉल के गेट पर आंदोलनकारियों को अंदर जाने से रोक रहे थे।

पीएसी को गोली न चलाने की गुहार कर रहे थे। लेकिन पीएसी और पुलिस ने उन पर ही गोली दाग दी। 15-20 मिनट में ही छह आंदोलनकारियों को मौत के घाट उतार दिया गया।

पुलिस और पीएसी का तांडव
झूलाघर में पुलिस और पीएसी का तांडव देखने के बाद शरीर में कंपन शुरू हो गई। तभी एंबुलेंस में सीओ उमाकांत त्रिपाठी और कुछ घायलों को सेंट मेरी अस्पताल ले जाया गया। अस्पताल में भीड़ बढ़ गई।

डॉक्टर नहीं थे। सीओ बाहर तड़पते रहे। कुछ देर बाद उन्होंने दम तोड़ दिया। मैंने पूछा, आपको गोली कैसे लगी। उन्होंने कहा मैं आंदोलनकारियों को बचा रहा था।

मेरे ही लोगों ने मुझे मार डाला। ‘जय उत्तराखंड’ कह उनके प्राण निकल गए। उनका यह अंतिम वाक्य एक पत्र में छपा। सीबीआई ने इस मामले में मुझ से लगभग आधा दर्जन बार पूछताछ की। सबसे लंबी पूछताछ नगरपालिका सभागार में हुई।

तब रिकॉर्डर भी नहीं था। उमाकांत त्रिपाठी को रिकॉर्ड भी नहीं कर सका। सीबीआई के अधिकारी ने पूछा आपके पास क्या सबूत है कि उन्होंने जय उत्तराखंड बोला। मैं निशब्द हो गया।

तुमने अधर्म किया
झूलाघर में छह लोगों की मौत की सूचना मिलते ही देहरादून और मसूरी के कोने-कोने से लोग सेंट मेरी अस्पताल पहुंच गए। तत्कालीन मसूरी विधायक राजेंद्र शाह बेहद गुस्से में थे। उन्होंने एडीएम तनवीर जफर अली से कहा कि निहत्थे आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाकर तुमने अधर्म किया।

सभी आंदोलनकारी गुस्से में थे। तत्कालीन एसडीएम बद्रीप्रसाद जसोला सुबकियां लेकर रो रहे थे।

सैकड़ों घायल हो गए
शहर में हाहाकार था। दुकानें बंद हो गई। शाम करीब चार बजे डीएम ने पूरे शहर में फ्लैग मार्च किया। कर्फ्यू लगा था। आंदोलनकारियों को रात के समय घर-घर से उठाया गया।

गोलीकांड के दूसरे दिन मुझे कचहरी से नाजिर सूर्यमणि का फोन आया कि पास लेने आ जाओ। मैंने कहा जगह-जगह पुलिस और पीएसी है। वह बोले-पुलिस को नाम बता देना।

कचहरी पहुंच कर्फ्यू पास लिया। महिला आंदोलनकारी सुभाषिनी बर्त्वाल के घर बच्चों के साथ रहा। कर्फ्यू पास होने से कई लोगों के घर दूध पहुंचाया।

15 सितंबर को आंदोलनकारियों ने मसूरी कूच का आह्वान किया। कूच की सूचना मिलते ही रेपिड एक्शन फोर्स बुला ली गई। बाटाघाट पर आंदोलनकारियों को रोका गया। कूच का नेतृत्व मौजूदा काबीन मंत्री प्रीतम सिंह पंवार कर रहे थे।

पुलिस ने बाटाघाट के पास आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज किया। सैकड़ों घायल हो गए। पुलिस ने नाकेबंदी कर दी। वुडस्टॉक स्कूल के प्रबंधन तंत्र ने आंदोलनकारियों की मद्द की।
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दो सितंबर के गोलीकांड को कैमरे में कैद करने वाले हरि सिंह गुनसोला ने बहादुरी दिखाई और हर सीन को कैमरे में कैद किया। उन फोटो ने ही पुलिस और पीएसी का बर्बर चेहरा दुनिया को दिखाया।

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