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इस बार LPG गैस निकालेगी नेताजी की हवा

Mon, 14 Apr 2014 03:14 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड में सिर्फ 45 प्रतिशत परिवारों को इस समय प्रदेश में रसोई गैस मुहैया हो पा रही है।
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40 प्रतिशत परिवारों के पास कनेक्शन
पहाड़ों में तो हाल और भी बुरा है। करीब-करीब सभी पर्वतीय जिलों में 40 प्रतिशत परिवारों के पास ही गैस के कनेक्शन हैं। उस पर एक तो करेला दूजा नीम चढ़ा।

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जिस आधी आबादी केपास गैस कनेक्शन हैं, उसे भी दस-दस किलोमीटर कई बार गैस सिलेंडर ढोना पड़ता है। उस पर समय से गैस न मिल पाने की शिकायत तो आम है ही।

रसोई गैस वैसे चुनाव में हर बार मुद्दा बनती रही है। 2007 में गैस किल्लत का मसला भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए खासे आक्रामक तरीके से उठाया था।

पहले भी हरा चुकी है रसोई गैस
2012 में टिहरी उपचुनाव के दौरान तत्कालीन कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा की हार का एक कारण चुनाव के दौरान रसोई गैस के दाम बढ़ना और सिलेंडर की राशनिंग भी था।

2014 लोक सभा चुनाव में हालात पहले से अलग नजर नही आ रहे हैं। गैस की किल्लत का आलम यह है कि पहाड़ में हफ्तों का इंतजार आम बात हो गई है।

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आपदा के कारण सड़कों को नुकसान हुआ था और इस कारण भी पहाड़ को खासे समय तक गैस की किल्लत का सामना करना पड़ा था।

पर हद तो यह है कि पहाड़ की आधे परिवारों केलोग खाना बनाने के लिए जंगल की लकड़ी, मिट्टी तेल आदि पर निर्भर हैं। सबसे बुरे हालात बागेश्वर और अल्मोड़ा के हैं। यहां हाल यह है कि 70 प्रतिशत परिवार जंगल की लकड़ी और मिट्टी तेल के भरोसे रह रहे हैं।
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कोई खास कोशिश नहीं हुई अभी तक
आंकड़े गवाह हैं कि राज्य गठन के बाद भी प्रदेश में रसोई गैस को घर-घर तक पहुंचाने की कोई खास कोशिश नही हुई। वैसे पहाड़ में गैस सप्लाई के लिए ट्रांसपोर्ट सब्सिडी भी है।

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पर सड़कों का अभाव और वितरकों की कमी के कारण गैसों को गांव तक पहुंचाना संभव ही नही हो पाता। गांव के लोगों के मुताबिक कई बार एक सिलेंडर की कीमत ही 500 रुपए से अधिक हो जाती है।

कारण यह भी है कि रोड हैड पर सिलेंडर पटक दिया जाता है और फिर रोड हैड से गांव तक पहुंचाने के लिए अलग से या तो कुली की व्यवस्था करो या फिर अपनी पीठ पर बोझा लादो।
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आखिर गैस के दाम का ही क्यों बनता है मुद्दा
अर्थशास्त्री डॉ. आदित्य गौतम के मुताबिक प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में करीब 80 प्रतिशत परिवार खाना बनाने के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल करते हैं।

जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 30 प्रतिशत आबादी ही रसाई गैस का इस्तेमाल करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन के अन्य विकल्प मौजूद हैं जबकि शहरों में निर्भरता रसोई गैस पर ही है।

चुनाव में महंगाई एक मुद्दा बनती है और इसी के लिहाज से रसोई गैस की कीमत का मामला भी इसमें जुड़ जाता है।
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