केदारघाटी में जून 2013 में बरपे कुदरत के कहर के बाद बची हजारों जिंदगियों के जख्म एक साल बाद भी भरे नहीं हैं।
गांव, घर, खेत, पैसा, रोजगार, व्यवसाय सब गवां चुके ये लोग आज उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां उनके लिए शाम की रोटी के जुगाड़ का सवाल हर सुबह उठता है।
कभी मालिक बने रहने वाले ऐसे करीब दस हजार परिवार आज दून में मजदूरी करने पर मजबूर हैं। कोई ढाबे पर बर्तन धोकर परिवार का गुजारा चला रहा है तो कोई दुकानों, गोदामों में दिहाड़ी कर नून-रोटी जुटा रहा है।
बड़ी बात यह है कि आपदा का दंश झेल चुके इन लोगों पर खौफ इस कदर तारी है कि अब वे केदारघाटी लौटने के बजाय दून में रहकर ही जिंदगी काटने का मन बना चुके हैं।
आपदा ने छीना पिता का साया
रमेश सिंह (15) आज से एक साल पूर्व गौरीकुंड से केदारनाथ तक अपने पिता के साथ खच्चर चलाता था। रमेश के पिता के पास तीन खच्चर थे।
हर रोज उन्हें डेढ़ से दो हजार रुपए की कमाई हो जाती थी। पूरा परिवार खुशहाल था। लेकिन आपदा ने पिता का साया छीना तो रोजी का जरिया खच्चर भी मारे गए।
परिवार की जिम्मेदारी रमेश के ऊपर आ गई। परिवार में मां है और दो जवान बहने हैं। गांव में न घर बचा, न काम तो रमेश दून आ गया। यहां मसूरी डायवर्जन पर एक ढाबे में वह बर्तन धोने का काम कर रहा है।
बिंदाल बस्ती में एक छोटी सी खोली में रह रहे लोग
चमनलाल का परिवार रुद्रप्रयाग में रहता था। वह खुद गौरीकुंड में चाय की दुकान चलाते थे।
आमदनी अच्छी थी और बेटा लड़का गौरव दून के डीएवी कॉलेज में ग्रेजुएशन कर रहा था। आपदा के दिन गौरव पिता के साथ चाय की दुकान पर था।
उफनाई नदी ने दुकान को खुद में समा लिया, जबकि गौरव को भी लील लिया। सब कुछ गवांने के बाद चमनलाल परिवार समेत दून आ गए। यहां पूरा परिवार बिंदाल बस्ती में एक छोटी सी खोली में रह रहा है।
चमन पटेलनगर स्थित एक गोदाम में ट्रकों पर सामान लोड, अनलोड का काम कर रहे हैं। कुछ दिन से बीमार हैं। डॉक्टर का कहना है कि उनका शरीर गर्मी नहीं सह पा रहा।
निगम करेगा सर्वे, रखेगा ख्याल
पलायन कर आए अधिकतर आपदा प्रभावित शहर की मलिन बस्तियों में रह रहे हैं। ऐसे में इन बस्तियों में लोड बढ़ने लगा है।
इसके बाद नगर निगम आपदा प्रभावित लोगों का सर्वे कराने की तैयारी में है। मेयर विनोद चमोली कहते हैं कि सर्वे कराकर पलायन करने वालों की सही संख्या मालूम की जाएगी।
उनके मुताबिक आपदा प्रभावितों के लिए निगम खास विकास योजनाएं शुरू करेगा।
मजदूरी घटी, मुनाफाखोरों की मौज
नेपाली मजदूर भी पहुंचे दून
नेपाली मूल के कई परिवार रुद्रप्रयाग और केदारघाटी में खच्चर चलाने, डांडी-कांडी उठाने, चाय की दुकानों पर काम करते थे।
आपदा के बाद इनमें से करीब 75 प्रतिशत परिवार भी दून आ गए हैं। इनकी संख्या दो हजार के करीब मानी जा रही है।
दून आए आपदा पीड़ितों को किसी भी हाल में परिवार के गुजारे के लिए नौकरी चाहिए थी। ऐसे में ढाबों, गोदामों में इन्होंने सस्ती मजदूरी पर समझौता कर लिया।
पहले जहां मजदूर पांच से आठ हजार रुपए कमा रहे थे, वहीं अब यह तीन हजार रुपए तक पहुंच गया है। मजदूरी का कंपटीशन बढ़ने से मुनाफाखोर मौज काट रहे हैं।