डॉ. बियानी कहते हैं कि आज हिमालय में होने वाली प्राकृतिक आपदाओं को विकास से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है और विकास को प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार बताया जाता है। वैश्विक तापमान में वृद्धि को हर समस्या का कारण माना जाने लगा है। ऐसा दृश्य प्रस्तुत किया जाता है कि यह सारी समस्याएं हाल ही में उत्पन्न हुई हैं। लेकिन अगर हम भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड देखें तो पता चलता है इस तरह की घटनाएं हमेशा से होती रही हैं।
पृथ्वी पर तापमान बढ़ने और घटने का क्रम कई बार हो चुका है। हिमनद पृथ्वी पर कम से कम 10 बार बने और नष्ट हुए हैं। पृथ्वी का पर्यावरण हमेशा परिवर्तनशील रहा है। आज भी हिमालय क्षेत्र में उतनी ही वर्षा होती है, जितनी पहले होती थी। बर्फबारी भी कम नहीं हुई है। फिर नदियों में पानी कम क्यों हो रहा है, यह एक विचारणीय विषय है।
डॉ. बियानी आगे कहते हैं कि तापमान में वृद्धि पिछले दस हजार वर्षों से लगातार चल रही है। यह अवश्य है कि वर्तमान में होने वाली वृद्धि दर पूर्व काल की वृद्धि दर के मुकाबले अधिक है। प्राकृतिक आपदाएं जैसे भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन, बाढ़, सूखा, बादल फटना इत्यादि को हमेशा मनुष्य के कार्यकलापों से नहीं जोड़ा जा सकता है। भूकंप पृथ्वी की उथल-पुथल का परिणाम होता है।
इसी तरह हिमस्खलन में भारी हिमपात के बाद बर्फ अस्थिर होकर नीचे की ओर फिसल जाती है। भूस्खलन प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारणों से हो सकता है। एकाएक बादल क्यों फट जाते हैं? इसके समुचित कारण वैज्ञानिक अभी तक नहीं ढूंढ पाए हैं। अतिवृष्टि से उत्पन्न होने वाली बाढ़ भी प्रकृति जनित है।
यह अवश्य है कि मनुष्य ने नदी किनारे निर्माण कर नदी के बहाव के मार्ग को छोटा कर दिया है, जिसके कारण जल प्रवाह विकराल रूप धारण कर लेता है। हर प्राकृतिक आपदा की घटना का तथ्यपरक समुचित विश्लेषण होना जरूरी है, ताकि जनमानस में जनित भ्रांतियों का निराकरण किया जा सके। डॉ. बियानी कहते हैं कि हिमालय में विकास भूवैज्ञानिक स्थिति के साथ संतुलन साधकर ही किया जाना चाहिए।