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हिमालय दिवस 2020 विशेष : तेजी से बदल रहा है हिमालय, इस खतरे की पड़ताल जरूरी

Mon, 07 Sep 2020 03:17 PM IST
Nirmala Suyal Nirmala Suyal सुधाकर भट्ट , अमर उजाला, देहरादून
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- फोटो : File Photo
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सदियों से हिमालय को देश का अभेद प्रहरी माना जाता रहा है। हिमालय और प्रकृति के रिश्ते में भी बदलाव आ रहा है। इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। जलवायु परिवर्तन एक बड़ा कारण है।

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हिमालय दिवस 2020: हिमालयी राज्यों तक ही सीमित न रहे हिमालय को बचाने की चुनौती

एक कारण हिमालय को लेकर हमारे नजरिये में आ रहा बदलाव भी है। हिमालय अब अभेद, दुर्गम, देश की रक्षा प्रहरी नहीं रह गया है। हिमालय दिवस पर इस बार इस रिश्ते की गहराई से पड़ताल करने की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है। इस बार की हिमालय दिवस की एक थीम यह भी है।
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मौसम में बदलाव, कहीं पानी की कमी तो कहीं ज्यादा बारिश, हिमालय अब आपदाओं का भी घर

हिमालय के तापमान से लेकर बारिश तक में अब बदलाव देखने को मिल रहा है। हिमालय के जंगल, पहाड़, नदियों में भी यह बदलाव सामने आ रहा है। पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी स्टेट ऑफ एनवायरमेंट रिपोर्ट ने इस बदलाव को चिह्नित करने की कोशिश की गई है।

रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में मौसम का अंतर कम होता जा रहा है। यह पाया गया है कि ग्लेश्यिर सिकुड़ रहे हैं। इसके कारण उच्च हिमालयी क्षेत्र में नई झीलें बन रही हैं। प्रदेेश के सात जिले ऐसे हैं जहां बारिश अब कम हो रही है। पहाड़ अब पहले की तुलना में अधिक गर्म हो रहे हैं। यह प्रभाव सिर्फ उत्तराखंड पर ही नहीं पूरे हिमालय क्षेत्र पर है।

अब आपदाओं के घर के रूप में भी जाना जा रहा हिमालय

इसका एक प्रभाव यह भी है कि हिमालय अब आपदाओं के घर के रूप में भी जाना जा रहा है। 2013 की केदारनाथ आपदा से इस बदलाव की भयावहता का मंजर भी सामने आया था। इसके बाद हर साल आपदा किसी न किसी रूप में सामने आ रही है। हर साल मानसून इसकी गवाही भी देता है। भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और नदियां उफान पर हैं।

विशेषज्ञों की माने तो हिमालय में आ रहे इस बदलाव को समझने की जरूरत भी है। अभी तक इसकी गहराई से पड़ताल भी नहीं की गई है। मसलन ग्लेशियरों को लेकर कोई समग्र अध्ययन भी अभी तक सामने नहीं आया है। 

कहनेे को प्रदेश सरकार की ओर से मौसम बदलाव के प्रभाव को कम करने के लिए करीब आठ हजार करोड़ रुपये की योजना बनाई गई है। इस योजना का अभी धरातल पर उतरना बाकी है। इसी तरह अभी यह भी देखा जाना है कि नदियों के व्यवहार में किस तरह का बदलाव हो रहा है।

जंगल बदल रहे हैं, लेकिन यह बदलाव किस तरह का और कितना है यह अभी पूरी तरह से साफ नहीं है। मसलन बांज के जंगलों में चीड़ तेेजी से बढ़ रहा है। इसका फर्क खेती पर भी पड़ा है। कई जगह उत्पादकता कम होने की बात भी सामने आई है। ऊर्जा प्रदेश के रूप में प्रदेश को स्थापित करने की कोशिश पर भी इसका फर्क पड़ सकता है। मानसून में नदियों में गाद की मात्रा अधिक होने के कारण कई जल विद्युत परियोजनाओं का असमय उत्पादन बंद भी करना पड़ता है।

संयुक्त प्रयास और व्यापक नजरिए की है जरूरत

मौसम बदलाव के प्रभाव को कम करने के लिए संयुक्त प्रयास और व्यापक नजरिए की आज सबसे अधिक जरूरत है। प्रदेश में पर्यटन, वन, पर्यावरण, शहरी विकास आदि विभाग हैं। विभाग अपने नजरिये से ही योजनाएं बनाते हैं।

एक समग्र नीति की जरूरत यहां महसूस होती है। दूसरी बात है कि मौसम बदलाव के प्रभाव को कम करने के लिए आम आदमी क्या करे। सरकार को कोशिश करनी चाहिए कि सरल भाषा में छोटे-छोटे, लेकिन प्रभावी कार्यों की जानकारी लोगों तक पहुंचाए। आदत में बदलाव लाकर बहुत सारी समस्याओं से पार भी पाया जा सकता है। बिजली, वाहन आदि का उपयोग करने से ही बड़ा फर्क पड़ सकता है। 

हिमालय के दृष्टिकोण से तो यह और भी महत्वपूर्ण है। हम जानते हैं कि बाढ़ कहीं आती है और बाढ़ आने का कारण कहीं और होता है। आज जरूरत है कि एक संयुक्त मंच के रूप में काम किया जाए। सरकार के साथ ही संस्थाओं और आम व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यह साफ है कि सबको मिलकर ही इस मोर्चे पर काम करना होगा।
अनूप नौटियाल, संस्थापक, सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्यूनिटीज
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उत्तराखंड के पांच बड़े भूकंप

साल  - भूकंप रिक्टर स्केल पर 
1803    9
1809    9
1816     7
1937      8
1916      7.5

अचानक आने वाली बाढ़
2013    केदारनाथ
2012    उत्तरकाशी
2011    बागेश्वर, देहरादून
2010    धारी, हरिद्वार, चंपावत, पौड़ी, चमोली, ऊधमसिंह नगर
2009    मुन्स्यारी, जोशीमठ, डीडीहाट

बादल फटने की घटनाओं में भी इजाफा
2002 खेतगांव
2004 रानीखेत
2007 पिथौरागढ़ और चमोली
2008 पिथौरागढ़
2009 मुनस्यारी
2010 कपकोट
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