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अब इंसानों से बदला ले रहा है हिमालय!

Tue, 09 Sep 2014 04:18 PM IST
सुधाकर भट्ट/ अमर उजाला, देहरादून
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हिमालय का संकट गहरा रहा है। यह संकट हमारे अस्तित्व का है। इस संकट से पार न पाया गया तो पहाड़ खाली हो सकते हैं। खेत फसल देने से मना कर सकते हैं। नदियों का पानी कम हो सकता है।
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स्वस्थ पहाड़ी जीवन में बीमारियां पैर जमा सकती हैं। अनाज की कमी हो सकती है। भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ एक डरावने सपने की तरह पीछा कर सकती है। जून 2013 की आपदा से ठीक दो साल पहले भी उत्तराखंड ने बरसात की मार झेली थी।

पूरे राज्य में इतनी बरसात हुई कि करीब 14 हजार किमी सड़क ध्वस्त हो गई। पहाड़ की लाइफ लाइन मानी जाने वाली सड़कों का जाल टूटा तो पहाड़ का जैसे दम ही घुट गया था।
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इस आपदा से राज्य उबर भी न पाया था कि जून 2013 की विभीषिका ने जैसे राज्य की कमर ही तोड़ कर रख दी। हजारों का जीवन संकट में था और काफी लोगों ने अपनी जान गंवाई।

भूस्खलन की घटनाओं में तेजी से इजाफा

केदारनाथ में औसत से ज्यादा बरसात और चोराबाड़ी झील के फटने से रामाबाड़ा तो नक्शे से गायब ही हो गया। पर्यटन प्रदेश उत्तराखंड को करीब 25 हजार करोड़ रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। इस त्रासदी की गूंज यहीं नहीं, पूरे देश में सुनाई दी थी।

यह दो उदाहरण काफी है यह बताने के लिए कि हिमालय का संकट किस कदर गहरा होता जा रहा है। इंटरनेशनल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज ने हाल ही में यह चेतावनी भी दी कि मौसम बदलाव के कारण बादल फटने, अचानक आने वाली बाढ़, तेज बरसात, सूखे जैसी घटनाओं में इजाफा होगा।

उत्तराखंड में यह देखने को मिल भी रहा है। मिट्टी का कटाव प्रदेश के लिए समस्या बन गया है। ऐसे में तेज बरसात भूस्खलन की घटनाओं में तेजी से इजाफा कर रही है।

तेजी से सिकुड़ रहा है गंगोत्री ग्लेश्यिर

यूसैक की रिपोर्ट के मुताबिक गंगोत्री ग्लेश्यिर तेजी से सिकुड़ रहा है। सदा शांत रहने वाली नीति घाटी में बादल गरज रहे हैं और बादल फट रहे हैं। बुग्यालों में तेज बरसात हो रही है। नदियों में गाद की मात्रा बढ़ जाने से जल विद्युत परियोजनाओं की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है।

प्लानिंग कमीशन की नवंबर 2013 में आई रिपोर्ट ने हिमालय के एक और संकट की ओर इशारा किया था। बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता में बनी कमेटी की इस रिपोर्ट में कहा गया कि पर्वतीय क्षेत्र दुनिया के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में से एक हैं।

 हिमालयी और उत्तर पूर्वी राज्यों में विकास का वह मॉडल होना चाहिए जो पर्यावरण संतुलन को न बिगाड़े। विकास का संकट भी हिमालयी राज्यों में गहरा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की सरकार ने केदारनाथ की आपदा के बाद जीईपी को लागू करने का दावा किया था। पर यह कवायद अब ठंडे बस्ते में है।

विकास और पर्यावरण के बीच की खींचतान को जताने के लिए केंद्रीय योजना आयोग ने डेवलपमेंट डिसेबिलटी इंडेक्स बनाया था। इसमें उत्तराखंड देश के ऊपरी पांच राज्यों में शामिल है। इस सूचकांक से यह जाहिर होता है कि विकास के मामले में हम कितने पिछड़ रहे हैं।

ये हैं चुनौतियां

मिट्टी का कटाव
उत्तराखंड राज्य मिट्टी के कटाव की समस्या से ग्रसित है। करीब 20 टन प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष से अधिक मिट्टी कटाव में बेकार हो जा रही है।

पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी जिले में इस भूमि कटाव के कारण 40 प्रतिशत से अधिक भूमि ‘कृषि के योग्य नहीं’ वर्ग में है। बागेश्वर और रुद्रप्रयाग में करीब 20 प्रतिशत और अन्य जिलों में करीब दस प्रतिशत भूमि इस वर्ग में है।

ग्लेश्यिरों का सिकुड़ना
उत्तराखंड राज्य को देश का वाटर टावर कहा जा सकता है। सौ दिन के अंतराल में करीब 1600 एमएम बरसात प्रदेश में होती है। प्रदेश का करीब 13 प्रतिशत भूभाग बर्फ से ढका हुआ है जिसमें करीब 900 ग्लेश्यिर हैं।

उत्तर भारत की बड़ी जनसंख्या कि लिए अलकनंदा, भागीरथी, यमुना, काली, शारदा और रामगंगा जल का प्रमुख स्रोत हैं। मौसम बदलाव के कारण ग्लेश्यिरों का सिकुड़ना अब स्वीकार किया जा रहा है।

30 किमी लंबे गंगोत्री ग्लेश्यिर के बारे में ही माना जा रहा है कि यह 1962 से लेकर 1991 केबीच करीब बीस मीटर प्रति वर्ष के हिसाब से सिकुड़ा।
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खेती पर संकट

प्रदेश के कृषि विभाग के आकलन के मुताबिक मौसम बदलाव के कारण खेती पर संकट है। अधिकतम बरसात का समय करीब 15 दिन पीछे खिसक चुका है। ऐसे में फसल उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

संवेदनशील पहाड़
जून 2013 की आपदा यह जानने के लिए पर्याप्त है कि संवेदनशील हिमालय किस तरह से और कितना अधिक नुकसान पहुंचा सकता है। ग्लेश्यिर में बनी झील के अचानक फटने से आने वाली बाढ़ किस हद तक तबाही मचा सकती है। नौ सौ से अधिक ग्लेश्यिर वाले हिमालय राज्य में यह संकट कितना बढ़ा हो सकता है इसका फिलहाल अंदाजा लगाना मुश्किल है।

नई-नई बीमारियां
स्वस्थ उत्तराखंड किस कदर बीमार हो सकता है यह अब सामने आ रहा है। अपेक्षाकृत सर्द क्षेत्रों में मलेरिया और अन्य बीमारियां पैर पसार रही हैं। आइएमडी के एक अध्ययन के मुताबिक प्रदेश में न्यूनतम और अधिकतम तापमान का अंतर कम हो रहा है। औसत तापमान बदल जाने से नए परजीवी पैदा हो रहे हैं।

अब भी समय है। सरकार समय का रुख देख ले। उत्तराखंड के बाद जम्मू कश्मीर यह बताने केलिए काफी है कि हिमालय का संकट कितना गहरा है। सरकारें अब भी न चेती तो समस्या लाइलाज बन जाएगी।
- अनिल जोशी, हैस्को के संस्थापक निदेशक

हमें अपनी प्राथमिकताओं को पहचानना होगा। यह देखना होगा कि विकास का कौन सा मॉडल हमारे लिए मुफीद है।
- आइके पांडे, प्रदेश सरकार के वित्त सलाहकार और पूर्व मुख्य सचिव
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