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साढ़े पांच हजार सरकारी स्कूल होंगे बंद!

Tue, 09 Sep 2014 12:04 PM IST
बिशन सिंह बोहरा, नलिनी गुसाईं/ अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड के शिक्षा विभाग को शायद ‘शिक्षित’ करने की जरूरत है। प्रदेश के स्कूलों में न जरूरी सहूलियतें हैं, न ही गुणवत्तापरक शिक्षा देने की व्यवस्था। नतीजतन लगातार सरकारी स्कूलों पर ताले लगते जा रहे हैं।
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स्कूलों के बंद होने की गति यही रही तो गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा का संकट पैदा हो जाएगा। एक और सरकारी महकमे पेयजल निगम की सुस्ती और लापरवाही की वजह से लोगों को पानी नहीं मिल पा रहा है। केंद्र से आया पैसा खर्च करने में नाकाम महकमा विश्व बैंक का कर्जा चढ़ाकर पानी पिलाने की तैयारी में है।

बंद होने के कगार पर साढ़े पांच हजार सरकारी स्कूल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है कि देश का हर बच्चा स्कूल जाए। यही नहीं पीएम का जोर स्किल्ड एजूकेशन पर भी है। शिक्षक दिवस पर बच्चों से संवाद कार्यक्रम में उन्होंने इसका जिक्र भी किया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह होगा कैसे?
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बच्चों को शिक्षित करने के लिए स्कूल तक नहीं

स्किल्ड एजूकेशन की तो छोड़िए, बच्चों को शिक्षित करने के लिए स्कूल तक नहीं हैं। जो स्कूल हैं उनमें शिक्षा की गुणवत्ता इतनी गिर गई है कि कोई अपने बच्चों को वहां पढ़ने के लिए नहीं भेज रहा है। घटती छात्र संख्या की वजह से सरकार ऐसे स्कूलों को बंद करने का फरमान सुना चुकी है।

शिक्षा विभाग के ही आंकड़े बताते हैं कि सत्र 2013-14 में प्रदेश में 178 स्कूल छात्र संख्या शून्य होने की वजह से बंद हो गए हैं। इनमें 129 प्राथमिक और 49 जूनियर हाईस्कूल हैं। इसके अलावा घटती छात्र संख्या की वजह से प्रदेश में 5,645 स्कूल बंद होने के कगार पर हैं।

इनमें 800 स्कूल ऐसे हैं, जिनमें छात्र संख्या पांच यह इससे कम रह गई है। बाकी स्कूलों में छात्र संख्या 20 या इससे कम है। सस्ती शिक्षा मुहैया कराने के लिए प्रदेश में 17,133 प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल खोले गए हैं, लेकिन इन स्कूलों में न पर्याप्त शिक्षक हैं और न ही संसाधन। छात्र संख्या में गिरावट की यह अहम वजह है।

स्कूलों में न पानी न शौचालय

शिक्षा विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के केवल प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में 3407 शिक्षकों की कमी है। 1117 स्कूलों में पेयजल की व्यवस्था नहीं है।

5481 स्कूलों में खेल के मैदान नहीं हैं। 997 स्कूलों में शौचालय नहीं है। ज्यादातर स्कूल नदी, नालों और जंगल के किनारे बनाए गए हैं। यही कारण है कि बच्चों ने इन स्कूलों से मुंह फेर लिया है।

स्कूलों में शिक्षकों के खाली पद
शिक्षा विभाग के ही आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। कई स्कूल संविदा शिक्षक और कई एकल शिक्षकों के सहारे चल रहे हैं। प्रवक्ता के सृजित 11141 पदों में से 4384 पद खाली हैं।

एलटी के सृजित 19,222 पदों में से 4459 पद खाली हैं। बेसिक के सृजित 39238 पदों में से 3407 पद खाली हैं। इंटर कॉलेजों में प्रिंसिपल के लिए सृजित 1170 पदों में से 737 पद खाली हैं। हाईस्कूलों में प्रिंसिपल के लिए सृजित  954 पदों में से 107 पद खाली हैं।

स्कूलों में सुविधाओं के लिए न तो प्रदेश सरकार पैसा दे रही है और न ही केंद्र सरकार। मुख्यमंत्री के आदेश हैं कि जिन स्कूलों में 10 से कम बच्चे हैं, उन्हें बंद कर दिया जाए। स्कूलों को बंद करने से पहले वहां बच्चों के लिए आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था की जाएगी।
- एस राजू, अपर मुख्य सचिव

पेयजल निगम का भी अजब हाल

प्रदेश में पहाड़ से लेकर मैदान तक लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। आए दिन पीने के पानी के लिए हाहाकार मचा रहता है, लेकिन उत्तराखंड पेयजल निगम पानी उपलब्ध कराने के लिए केंद्र से मिले पैसे को खर्च तक नहीं कर पा रहा है। दूसरी ओर, विश्व बैंक से कर्ज लेकर पानी उपलब्ध कराने की कवायद हो रही है।

इससे निगम की क्षमता और मंशा पर तरह-तरह के सवाल उठने लगे हैं। दरअसल, राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता कार्यक्रम (एनआरडीडब्लूपी) के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और सेनीटेशन व्यवस्था समेत विभिन्न विकास कार्यों के लिए केंद्र सरकार उत्तराखंड सरकार को मदद देती है।

इस योजना के तहत केंद्र की तरफ से प्रदेश को तीन साल में 500 करोड़ रुपये दिए जा चुके हैं, लेकिन पेयजल निगम इस राशि को खर्च नहीं कर पाया। बीते तीन साल में आपदा के दौरान पेयजल योजनाओं को हुए नुकसान के बावजूद मरम्मत में इस रकम का इस्तेमाल नहीं किया गया।

जबकि इन्हीं कार्यों के लिए पेयजल निगम विश्व बैंक से लोन ले रहा है। विभागीय अधिकारी सवाल करते हैं कि जब पेयजल निगम के पास केंद्र से मिला 500 करोड़ रुपये है तो विश्व बैंक से उधार क्यों लिया जा रहा है?
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केंद्र ने किया किस्त देने से इनकार

राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल एवं स्वच्छता कार्यक्रम (एनआरडीडब्लूपी) का पैसा तीन साल में खर्च नहीं कर पाने पर केंद्र ने उत्तराखंड को अप्रैल 2014 में नई किस्त जारी करने से मना कर दिया। केंद्र ने कहा कि पहले पिछली रकम को खर्च किया जाए। सूत्र बताते हैं कि अब योजनाओं में प्लस-माइनस कर केंद्र को कागजों पर खर्च दिखाने की तैयारी है।

विश्व बैंक से शर्तों पर लोन
केंद्र से पेयजल निगम को रकम बिना शर्त मिलती है, जबकि विश्व बैंक से लोन में स्वैप मोड से गांवों में काम कराने की शर्त पूरी करनी थी। पेयजल निगम के स्वजल के जरिये स्वैप में काम कराने पर ही लोन मिलना शुरू हुआ।

वर्ष 2006 में प्रदेश में स्वैप मोड लागू किया गया था। खास बात यह है कि उत्तराखंड इसे लागू करने वाला उत्तर भारत का पहला राज्य है। दूसरी ओर, पड़ोसी राज्यों यूपी और हिमाचल ने इसे लागू तक नहीं किया है।

बैंक से 720 करोड़ का लोन
स्टेट वाटर सेनीटेशन मिशन के मुख्य अभियंता योगेंद्र सिंह ने बताया कि पेयजल निगम ने विश्व बैंक से 120 मिलियन डॉलर यानी 720 करोड़ रुपए बतौर लोन लेने का करार किया है। अब तक 564.55 करोड़ रुपए लिए जा चुके हैं। वर्ष 2006 से लोन लेना शुरू किया गया था।

15 नवंबर 2016 से उत्तराखंड को उधार चुकाना होगा। पहली किस्त में दस साल यानी 2026 तक मूल राशि पर 1.25 प्रतिशत ब्याज चुकाना होगा। इसके बाद अगले 15 साल यानी 2026 से 2041 तक 2.5 प्रतिशत ब्याज दर लगेगी।

स्वैप से पिछड़ी योजनाएं
स्वैप मोड लागू करने से विकास कार्यों की रफ्तार थम गई है। इसके तहत गांव के प्रधान के माध्यम से समिति गठित कर गांववालों के सहयोग से पेयजल योजना तैयार की जाती है। पेयजल निगम इसमें सिर्फ तकनीकी सलाह दे सकता है।

ठेकेदारों और ग्राम पंचायत के स्तर पर काम धीमा पड़ने से कुछ सुस्ती हो गई थी। हालांकि 40 प्रतिशत बजट खर्च किया गया है। इस दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। जल्द ही बाकी 60 प्रतिशत बजट भी खर्च कर लिया जाएगा। इसके बाद केंद्र को यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट भेजा जाएगा। सभी जगह पेयजल व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए ही वर्ल्ड बैंक से लोन लिया गया है।
- भजन सिंह, एमडी पेयजल निगम
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