अखाड़ों की राजनीति से सरकार के नेता एवं मंत्री भी असमंजस में फंस गए हैं। अभी तक नई कार्यकारिणी पदाधिकारियों के स्वागत से स्थानीय विधायक से लेकर सरकार के मंत्रियों ने दूरियां बनाई हैं। 27 अक्तूबर को मनसा देवी ट्रस्ट अध्यक्ष और अखाड़ा परिषद के नवनियुक्त अध्यक्ष श्रीमहंत रविंद्रपुरी हरिद्वार पहुंचेंगे।
दोनों अध्यक्षों में सरकार और संत समाज के लिए कौन सर्वमान्य होगा, आने वालों महीनों में साफ हो जाएगा। बता दें कि 2013 के प्रयागराज कुंभ से पहले भी अखाड़ा परिषद में दो फाड़ हुए। उस वक्त अयोध्या के श्रीमहंत ज्ञानदास परिषद के अध्यक्ष थे। परिषद में दो फाड़ होने के बाद निर्मल अखाड़े के बलवंत सिंह दूसरे गुट के अध्यक्ष बन गए। कुछ महीनों में ही आपसी सुलह हो गई।
प्राचीन परंपरा के निर्वहन से सजा ताज
श्री निरंजनी अखाड़े के सचिव श्रीमहंत रविंद्रपुरी अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष चुन लिए गए। उनका चयन अखाड़े की प्राचीन परंपराओं के अनुसार हुआ। अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष दिवंगत नरेंद्र गिरि श्री निरंजनी अखाड़े के श्रीमहंत थे।
प्राचीन परंपरा के अनुसार उनके निधन के बाद अध्यक्ष की कुर्सी के लिए अखाड़े के संत का ही पहला हक था। अखाड़े के सचिव रविंद्रपुरी ने अध्यक्ष के लिए दावेदारी की और सात अखाड़ों ने बैठक में पहुंचकर तो बैरागी अखाड़े के एक श्रीमहंत ने पत्र भेजकर रविंद्रपुरी को समर्थन दिया। आठ अखाड़ों के समर्थन से रविंद्रपुरी अध्यक्ष चुने गए।