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हिमालय में सूक्ष्मजीवी से बना ईंधन

Fri, 20 Dec 2013 03:30 PM IST
अंकित कुमार गर्ग/ अमर उजाला, रुड़की
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आईआईटी रुड़की की वैज्ञानिक ने हिमालय की तुंगनाथ पहाड़ी में रोडोस्पोरीडियम नामक यीस्ट (सूक्ष्मजीवी) को आइसोलेट कर बायोफ्यूल (जैविक ईंधन) बनाने में कामयाबी हासिल की है।
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शोध रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी जाएगी
बर्फ के 25 फुट नीचे की मिट्टी में यीस्ट से तैयार बायोफ्यूल बनाने का यह तरीका सबसे उन्नत होने का दावा किया जा रहा है। यह शोध रिपोर्ट जल्द ही केंद्र सरकार को सौंपी जानी है।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रोजेक्ट पर शोध कर रहीं वैज्ञानिक डॉ. पारुल अग्रवाल प्रुथी ने दो साल की मेहनत के बाद मॉडल के तौर पर बायोफ्यूल तैयार किया है। यीस्ट के बायोमास (वजन) का 70 फीसदी तक बायोफ्यूल बना लिया गया है।
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फोर्थ जेनरेशन के इस शोध में यीस्ट के जरिए तैयार किया गया बायोफ्यूल दुनिया में अपनी तरह का पहला शोध है। इससे पूर्व इस दिशा में हुए फर्स्ट जेनरेशन के शोध में खाने-पीने की चीजों जैसे पीनेट और सनफ्लावर से बायोडीजल बनाने पर प्रयोग हुए हैं। उनसे खाद्य पदार्थों पर संकट गहराने का खतरा था।

पेट्रो पदार्थों के मूल्य कम होने की संभावना
परियोजना अन्वेषक डॉ. पारुल के अनुसार बड़ी मात्रा में बायोफ्यूल बनाया जाएगा तो इसके दाम काफी कम हो सकते हैं। बाहर से आयातित पेट्रो पदार्थों पर लगने वाले टैक्स की भी बचत हो सकती है।

पेट्रो पदार्थों में सल्फर और कार्बन मोनो आक्साइड से पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, जबकि यीस्ट से बना बायोडीजल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता।

प्रचुर मात्रा में मिल सकता है बायोफ्यूल
यीस्ट (सूक्ष्मजीवी) से बायोफ्यूल बनाने के लिए न तो खाद्य पदार्थों की जरूरत पड़ेगी और न ही खेतों में पौधों को उगाने की। इस यीस्ट को कहीं भी किसी भी तापमान पर विकसित किया जा सकता है। यीस्ट की प्रकृति रिनुएबल और रिसाइकिल्ड होने के चलते प्रचुर मात्रा में बायोफ्यूल प्राप्त किया जा सकता है।

50 लाख रुपए का शोध
केंद्रीय मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने 15 दिसंबर, 2011 को आईआईटी को टैग एक्यूमुलेटिंग जेनेटिकली इंजीनियर्ड यीस्ट स्ट्रेनल ऐज मॉडल फॉर बायोफ्यूल नामक प्रोजेक्ट दिया। इसकी लागत 50 लाख रुपए है।

शोध में फ्लोरशंस माइक्रोस्कोप, नैनो ड्रॉप 3300 स्पेक्ट्रोफ्लोरो मीटर नामक यंत्र का प्रयोग किया गया। प्रोजेक्ट की प्रधान अन्वेषक एवं बायोटेक डिपार्टमेंट में वैज्ञानिक डॉ. पारुल अग्रवाल प्रुथी के अलावा शोधार्थी आलोक कुमार पटेल, मोहम्मद परवेज और फरहा दीवा ने इस शोध पर काम किया है।
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