मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे स्थानीय फसलों और बीजों को भी प्रोत्साहन और संरक्षण मिलेगा। उन्होंने बदरीनाथ धाम का उदाहरण भी दिया, जहां बीते वर्ष तीन महिला स्वयं सहायता समूहों ने स्थानीय उत्पाद मंडुवे, कुट्टू और चौलाई से प्रसाद तैयार किया। बांस और रिंगाल से बनी टोकरियों में इसकी पैकेजिंग की गई। बताया कि 10-10 महिलाओं के तीन समूहों ने बदरीनाथ धाम में मात्र दो महीने में 19 लाख रुपये का ऑर्गेनिक प्रसाद बेचा।
प्रसाद की इनपुट लागत 10 लाख रुपये रही और 9 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। इस तरह समूह की प्रत्येक महिला को 30 हजार रुपये की आमदनी हुई। इस प्रयोग की सफलता के बाद प्रदेश के 625 मंदिरों में स्थानीय उत्पादों से निर्मित प्रसाद बेचे जाने की तैयारी शुरू की गई है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड में हर वर्ष करीब तीन करोड़ श्रद्धालु आते हैं। इनमें से मात्र 80 लाख श्रद्धालुओं को 100-100 रुपये का प्रसाद बेचा जाए तो महिला समूहों को 80 करोड़ का व्यवसाय मिल सकता है और इसमें से आधी राशि मुनाफे में तब्दील हो सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के अवसर भी मिलेंगे। इस अवसर पर पद्मश्री अनिल जोशी, सूचना सचिव डॉ. पंकज कुमार पांडेय, मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट, मीडिया कोऑर्डिनेटर दर्शन सिंह रावत मौजूद रहे।
केदारनाथ, मद्महेश्वर और तुंगनाथ में मिलेगा 9 स्थानीय उत्पादों का प्रसाद
बाबा केदार के भक्तों को केदारनाथ, मद्महेश्वर और तुंगनाथ धाम में नौ स्थानीय उत्पादों वाला प्रसाद दिया जाएगा। प्रसाद में चौलाई के लड्डू, खुमेरा, केदारनाथ संगम का जल, बेल पत्र, शहद, बाबा केदार की भस्म, स्थानीय धूप व बाबा केदार का सिक्का शामिल है। डीएम मंगेश घिल्डियाल ने बताया कि जिले में प्रसाद तैयार करने का जिम्मा एकीकृत आजीविका और सहकारिता संस्था को सौंपा है।
प्रसाद व्यवस्था के तहत बदरी-केदार मंदिर समिति धाम से बाबा केदार की भस्म, बाबा केदार का सिक्का व संगम का जल उपलब्ध कराएगी। प्रशासन संस्थाओं के सहयोग से अन्य उत्पाद तैयार कर उनकी पैकिंग करेगा। 29 अप्रैल को केदारनाथ के कपाट खुलने पर प्रसाद के एक लाख पैकेट धाम में भेज दिए जाएंगे। मुख्य विकास अधिकारी डीआर जोशी का कहना है कि भविष्य में केदारनाथ के प्रसाद को स्थानीय खुले बाजार में भी उतारा जाएगा, ताकि श्रद्धालु आसानी से प्रसाद खरीद सकें।