चीड़ के दरख्त धीरे-धीरे उत्तराखंड के जंगलों से बेदखल होंगे। वन विभाग ने चीड़ के बजाए देवदार के पेड़ लगाने शुरू कर दिए हैं।
गढ़वाल और कुमाऊं मंडल में अब तक विभाग ने देवदार की 18 वनियां (छोटे जंगल) लगा दी हैं। यह माना जाता है कि देवदार के जंगलों में पशु-पक्षियों को वास स्थल बनाना अधिक पसंद है, साथ ही लोग इसे शुभ मानते हैं।
देवदार के जंगलों में जल संचयन अच्छा होता है। इसके अलावा वन विभाग चीड़ के दरख्तों को दरकिनार कर वनाग्नि की घटनाएं भी रोकना चाहता है। चीड़ के पत्तियों के कारण जंगलों में आग का खतरा अधिक होता है।
वन विभाग खुद देवदार की वनियां तो लगा ही रहा है साथ ही विभाग के प्रदेश स्तर पर चल रहे पौधारोपण अभियानों में भी देवदार को तवज्जो दी जा रही है। लोगों को भी देवदार के पौधे लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विभाग ने अपनी योजनाओं में जिन वृक्षों के पौधे लगाने के लिए मना किया है उनमें चीड़ भी शामिल है।
वन विभाग चाहता है कि लोग चीड़ के पौधे न रोपें। प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड एसके चंदोला का कहना है कि देवदार के वृक्षों से मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी बनी रहती है। इसमें कई ‘आर्गेनिज्म’ पैदा होते हैं और जल संरक्षण भी अच्छा होता है। देवदार के जंगलों में जैव विविधता का संरक्षण होता है।
चंदोला ने बताया कि जंगलों से चीड़ के वृक्षों को काटा तो नहीं जा रहा है, लेकिन तवज्जो देवदार को दी जा रही है। चीड़ के जंगलों में पशु-पक्षी वास स्थल कम बनाते हैं। इसके पतले पत्ते आग जल्दी पकड़ लेते हैं। देवदार की वनियां और स्थापित की जाएंगीं।
देवदारों में आस्था होने का लोगों के पास जो भी तर्क हो, लेकिन देवदार में श्रद्धा होने की वजह से लोग इनका संरक्षण करेंगे। चीड़ की तुलना में देवदार की लकड़ी अधिक कीमती होती है और उपयोगी भी। प्रदेश में देवदार की वनियों की संख्या और बढ़ाई जाएगी।
छोटे जंगलों को वनिया नाम दिया गया है। एक वनिया में दो हजार से लेकर पांच हजार तक पेड़ होते हैं। वनिया दो से सात हेक्टेयर तक की होती हैं। चीड़ की लकड़ी सात-आठ हजार रुपए घन मीटर बिकती है, वहीं देवदार की लकड़ी 50 हजार रुपए घन मीटर के हिसाब से बिकती है।