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उत्तराखंड में कांग्रेस के 'चक्रव्यूह' को भेद नहीं पाई भाजपा

Sun, 12 Jun 2016 11:25 AM IST
कृष्णेंदु  कुमार/ अमर उजाला, देहरादून
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narendra modi - फोटो : ANI
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राज्यसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड के लिए भाजपा ने जो रणनीति बनाई थी, उसमें उसे सफलता तो नहीं मिली, लेकिन एक विधायक और एक प्रदेश पदाधिकारी से हाथ जरूर धोना पड़ा।
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हालांकि भाजपा कह रही है कि पार्टी ने अपना प्रत्याशी राज्यसभा के चुनाव में नहीं उतारा था, निर्दलीय को समर्थन दिया था। लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी भी तो भाजपा का सक्रिय कार्यकर्ता था। चुनाव को लेकर भाजपा ने अपने विधायकों को व्हिप भी जारी कर रखा था।

प्रदेश प्रभारी ने शुक्रवार को विधायकों के साथ मीटिंग भी की थी। गीता ठाकुर पर अनिल गोयल को समर्थन करने का दबाव भी पार्टी की ओर से डाला गया था, जिन्होंने इसके विरोध में भाजपा छोड़ने का एलान कर दिया। भाजपा ने राज्यसभा चुनाव को लेकर जो रणनीति बनाई थी, उसमें उसकी काफी किरकिरी हुई है।
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18 मार्च से प्रदेश में राजनीतिक उठापटक का जो दौर शुरू हुआ उसमें भाजपा को शिकस्त का सामना ही करना पड़ा। चाहे बागी विधायकों का मामला हो या फिर फ्लोर टेस्ट का भाजपा के रणनीतिकारों की रणनीति पूरी तरह से विफल साबित हुई। ऐसा भी नहीं है कि इसका सारा दोष प्रदेश नेतृत्व का है, इसमें भाजपा के राष्ट्रीय स्तर के रणनीतिकार भी शामिल रहे।
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ऐन मौके पर धनै ने लिया यू टर्न

अजय भट्ट - फोटो : AmarUjala
फ्लोर टेस्ट के दौरान तो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय व प्रदेश प्रभारी श्याम जाजू देहरादून में डेरा डाले रखा था। इसके बाद भाजपा ने राज्यसभा के चुनाव में पर्याप्त संख्या बल का हवाला देकर चुनाव न लड़ने का एलान किया और निर्दलीय प्रत्याशी को समर्थन देने की बात कही।

पीडीएफ के दिनेश धनै द्वारा राज्यसभा का चुनाव लड़ने का एलान करने के बाद भाजपा ने उनको समर्थन देने की तैयारी भी कर ली थी। ऐन मौके पर धनै ने यू टर्न ले लिया। इसके बाद भाजपा ने अपने दो कार्यकर्ताओं गीता ठाकुर व अनिल गोयल का निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में नामांकन दाखिल करा दिया।

इसके बाद भाजपा ने गीता ठाकुर से अनिल गोयल को समर्थन देने को कहा। गीता ने शुक्रवार की सुबह गोयल को समर्थन देने की बात तो कही, लेकिन शाम को पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया। इसी तरह से शुक्रवार रात भाजपा के भीमताल से विधायक दान सिंह भंडारी ने अपना इस्तीफा दे दिया। अब देखना होगा कि राज्यसभा चुनाव में हुई किरकिरी के लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाता है?

चुनाव में भाजपा का प्रत्याशी मैदान में नहीं था। हमने निर्दलीय को समर्थन दिया था। कांग्रेस से अलग होने वाले नौ विधायकों की सदस्यता रद्द नहीं की गई होती आज स्थिति दूसरी होती। विधानसभा अध्यक्ष ने विधायकों के मामले में जो फैसला लिया उससे ही स्थिति बदली। संवैधानिक व्यवस्था में विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर सवाल नहीं उठाए जा सकते हैं, लेकिन इस पर चर्चा की जरूरत है। इसी संवैधानिक व्यवस्था का लाभ कांग्रेस को मिला है। जब चुनाव में हमारा प्रत्याशी ही नहीं था, तो इसकी जिम्मेदारी का सवाल कहां से पैदा होता है?
- अजय भट्ट, प्रदेश अध्यक्ष, भाजपा
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