सोशल डेवलपमेंट फॉर कम्युनिटी फाउंडेशन (एसडीसी) के संस्थापक एवं समाज सेवी अनूप नौटियाल ने कहा कि उत्तराखंड में क्लाइमेट लीडरशिप मॉडल बनाने की जरूरत है। अगले 10 वर्षों में इस मॉडल के आधार पर उत्तराखंड जलवायु परिवर्तन की दौड़ में अग्रणी स्थान प्राप्त कर सकता है। इस ख्याति को हासिल करने में उत्तराखंड के पास संसाधन और क्षमता है।
अमर उजाला उत्कृष्टता सम्मान समारोह में आगामी दशक में उत्तराखंड की प्राथमिकता विषय पर परिचर्चा में अनूप नौटियाल ने कहा कि 2021 में ग्लासगो में कॉप-26 सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन को लेकर पंचामृत का संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का पंचामृत कैसा हो सकता है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है। जलवायु परिवर्तन की दौड़ में हमारा सपना उत्तराखंड को अग्रणी स्थान दिलाने का होना चाहिए।
2014 में उत्तराखंड ने जलवायु परिवर्तन का रखा था खाका
इसके लिए प्रदेश में क्लाइमेट लीडरशिप मॉडल बनाना होगा। उन्होंने कहा कि जिस तरह से एक मरीज को डॉक्टर मल्टी विटामिन देता है। उसी तरह जलवायु परिवर्तन में समग्र विकास भी एक मल्टी विटामिन की तरह है। उन्होंने कहा कि पहली बार 2008 में क्लाइमेट एक्शन प्लान की चर्चा शुरू हुई थी। 2014 में उत्तराखंड ने जलवायु परिवर्तन का खाका रखा था। उन्होंने कहा कि मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों के जनसंख्या घनत्व में भारी अंतर आ रहा है।
इस पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन को लेकर हमारे सामने कई चुनौतियां भी हैं। राज्य गठन के समय उत्तराखंड 4 लाख वाहन पंजीकृत थे। 20 सालों में इनकी संख्या 32 लाख तक पहुंच गई है। वाहनों की संख्या में आठ गुना बढ़ोतरी हुई। जबकि इसके सापेक्ष सड़कें सिर्फ तीन गुना ही बढ़ीं। उन्होंने कहा कि अक्षय ऊर्जा, पहाड़ों में ग्रीन बिल्डिंग पर फोकस करना होगा। उन्होंने राज्य के विकास में जनसहभागिता और जन संवाद को भी अहम बताया। उन्होंने कहा कि कोई भी नीति बिना जनसहभागिता के सफल नहीं हो सकती है।
लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी के पूर्व निदेशक संजीव चोपड़ा ने कहा कि उत्तराखंड देश के महत्वपूर्ण राज्यों में आता है। उत्तराखंड गरीबी से मुक्ति पाने वाला देश का पहला राज्य बन सकता है। इस लक्ष्य को 10 साल में नहीं, बल्कि दो साल में पूरा किया जा सकता है। इसके लिए भारी भरकम बजट की जरूरत नहीं है। सिर्फ दृष्टिकोण में बदलाव लाने की आवश्यकता है।
अमर उजाला के 75वें वर्ष में प्रवेश के उपलक्ष्य पर आयोजित उत्कृष्टता सम्मान समारोह में आगामी दशक में उत्तराखंड की प्राथमिकता पर परिचर्चा में संजीव चोपड़ा ने कहा कि उत्तराखंड में 10 प्रतिशत लोग बीपीएल श्रेणी (गरीबी रेखा से नीचे) हैं। युवाओं को कौशल विकास का प्रशिक्षण देकर सर्विस सेक्टर को बढ़ावा देकर उत्तराखंड को गरीब मुक्त राज्य बनाया जा सकता है। राज्य के युवाओं को सक्षम बनाने की जरूरत है। जिससे प्रदेश का नौजवान न्यूनतम मजदूरी से हट कर ऐसे क्षेत्र में जाएं, जहां वह सम्मान पा सके।
10 प्रतिशत विनिर्माण और 28 प्रतिशत सर्विस सेक्टर की
उन्होंने सुझाव दिया कि ग्राम्य विकास विभाग का नाम बदल कर कौशल विकास विभाग किया जाना चाहिए। मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों के बीच की खाई को दूर करने की आवश्यकता है। प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों के विकास पर फोकस करना होगा। इसके लिए देहरादून के बजाय दूरदराज क्षेत्रों में अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती करनी होगी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का अध्ययन किया जाए तो इसमें कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी10 फीसदी की है। जबकि 10 प्रतिशत विनिर्माण और 28 प्रतिशत सर्विस सेक्टर की है।
आने वाला युग सर्विस सेक्टर का है। सर्विस सेक्टर को विकसित करने के लिए रूपरेखा बनाई जानी चाहिए। उन्होंने देश की रक्षा में उत्तराखंड की अहम भूमिका है। रक्षा के साथ राज्य का एक घनिष्ठ रिश्ता रहा है। लेकिन आने वाले 20 सालों में जो लड़ाई लड़ी जाएगी, वह बंदूक से नहीं होगी। वह लड़ाई इंटेलिजेंस और स्पेस तकनीकी से लड़ी जाएगी। उत्तराखंड में आईआईटी समेत कई बड़े संस्थान है। जिनके ज्ञान और तकनीकी से हम आने वाले समय के लिए देश की रक्षा नींव रख सकते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान(आईआईटी) रुड़की के निदेशक प्रो. अजीत चतुर्वेदी ने कहा कि राज्य के विकास के लिए नवाचार (इनोवेशन) को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके लिए उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों और छात्रों को इनोवेटिव काम पर विशेष ध्यान देना होगा। जिससे समाज के ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा सके।
अमर उजाला उत्कृष्टता सम्मान समारोह में आगामी दशक में उत्तराखंड की प्राथमिकता विषय पर परिचर्चा में निदेशक चतुर्वेदी ने कहा कि राज्य के विकास के लिए आईआईटी रुड़की ने विशेष योजनाएं बनाई है। उत्तराखंड के युवाओं के लिए एमटेक और पीएचडी में इंटर्नशिप स्कॉलर की स्कीम शुरू की है। इसके अलावा आईआईटी के छात्रों और वैज्ञानिकों के सूचना प्रौद्योगिकी ज्ञान को साझा करने के लिए टेक सारथी चलाई है। जिसमें आईआईटी की ओर से प्रदेश में स्थापित उद्योगों को आईटी के माध्यम से समस्याओं का समाधान करने में सहयोग किया जा रहा है।
कृषि और सर्विस सेक्टर में नवाचार की ज्यादा संभावनाएं
निदेशक ने कहा कि इंजीनियरिंग के क्षेत्र में लड़कियों की भागीदारी कम होने से आईआईटी ने शंकुतला (स्कीम फॉर एस्पीरेंट्स ऑफ नॉलेज अंडर टेलेंट एडवांसमेंट) फेलोशिप योजनाएं शुरू की है। जिसमें उत्तराखंड की लड़कियां 6 मई तक आवेदन कर सकती है। उच्च शिक्षण संस्थान के छात्रों के नवाचार आइडिया को स्टार्ट अप के क्षेत्र में प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इससे प्रदेश में नए उद्योग स्थापित होंगे।
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कृषि और सर्विस सेक्टर में नवाचार की ज्यादा संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति लागू की है। इस नीति से शिक्षा क्षेत्र में मानसिकता बदलने का काम किया है। नीति में ऐसे कार्यक्रम बनाए हैं। जिसकी छात्रों को जरूरत है। एक तरह से नई शिक्षा नीति ने बंद दरवाजे खोले दिए हैं। उन्होंने कहा कि कोविड महामारी ने आनलाइन शिक्षा को अवसर में बदला है। ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच ज्यादा हुई है।
सुप्रसिद्ध पर्यावरण आंदोलनकारी पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि राज्य के विकास के लिए दोहरी नीति अपनाना ठीक नहीं है। वर्ष 2013 में आई केदारनाथ आपदा से सबक लेना होगा। उन्होंने पिघलते ग्लेशियरों पर चिंता जताते हुए कहा कि विकास के लिए परिवर्तन हो रहे हैं और संवेदनशीलता खत्म हो रही है।
बृहस्पतिवार केे अमर उजाला उत्कृष्टता सम्मान समारोह में आगामी दशक में उत्तराखंड की प्राथमिकता पर परिचर्चा में पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट ने कहा कि ग्लेशियरों के मुहाने पर इको सेंसटिव जोन में बड़े-बड़े परियोजनाओं को लगाने की मंजूरी दी जा रही है। लेकिन एक गांव तक सड़क बनाने के लिए इको सेंसिटिव जोन के मानकों को हवाला दिया जाता है।
विकास के लिए किए जाने वाले परिवर्तनों का लोगों पर क्या असर?
विकास में इस तरह की दोहरी नीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि 2013 में केदारनाथ आपदा आई। उस समय इस आपदा को समझने के लिए उत्तरकाशी से लेकर पिथौरागढ़ तक यात्रा की। इस दौरान भागीरथी, अलकनंदा, यमुना, सरयू, धौली नदियों में आई बाढ़ से भारी नुकसान हुआ।
केदारनाथ के बाद चमोली जिले के रैणी गांव में आई आपदा से सबक लेना होगा। विकास के लिए जो परिवर्तन किए जा रहे हैं। उससे लोगों की आजीविका और पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। इसकी कोई सुध लेने वाला नहीं है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के घटने से जो दुष्प्रभाव पड़ रहा है। उसका अध्ययन करने के लिए उन्होंने केंद्र सरकार से एक अलग से विभाग बनाने का सुझाव दिया था। लेकिन आज तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है।