ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
सनातन परंपरा में पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य के लिए कई व्रतों का जिक्र आता है। इन्हीं में से एक है हरतालिका तीज का व्रत। इस व्रत को मुख्य रूप से गोरखाली समाज की महिलाएं रखती हैं। मान्यता है माता पार्वती को वर्षों की घोर तपस्या के बाद इसी दिन भगवान शिव की प्राप्ति हुई थी। इसीलिए कहा जाता है कि इस व्रत को रखने वाली स्त्री को मां पार्वती अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान देतीं हैं।
गोरखाली समाज में मान्यता है कि व्रत के दौरान कन्याएं और महिलाएं पूरी रात जागकर पूजा करतीं हैं। भगवान शिव की पहली अर्धांगिनी सती के देहांत के बाद हिमालय की पुत्री पार्वती ने उन्हें पाने के लिए वर्षों तक घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें वरदान मांगने को कहा तो उन्होेंने वर के रूप में स्वयं भगवान शिव को मांगा था। गोरखाली समाज में मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन इसी दिन हुआ था। इस दिन कथा सुनने का भी काफी महत्व है।
हरितालिका तीज की यह पूजा रातभर चलती है। इस दौरान महिलाएं पूरी रात कथा कीर्तन करतीं हैं। इस समय भगवान शिव और पार्वती का बेल पत्र, आम के पत्तों से अभिषेक किया जाता है। शिव स्त्रोत और आरती का पाठ करने के बाद पूजा की जाती है। सुबह अंतिम पूजा के बाद माता गुजरी पर सिंदूर चढ़ाकर सुहागिन महिलाएं मांग में लगातीं हैं। फिर हलवे का भोग लगाया जाता है।
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तीन दिन तक मनाया जाता है पर्व
पहले दिन व्रत रखने से पहले महिलाएं दर खाने जाती हैं। जहां उन्हें गोरखाली पकवान बनाकर खिलाए जाते हैं। 12 बजे से महिलाओं का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है। जो 36 घंटे चलता है। वहीं दूसरे दिन सुहागिने सुबह उठ कर स्नान आदि के बाद एक चौकी पर साफ वस्त्र बिछा कर उस पर शिव, पार्वती और गणेश की मूर्तियों को स्थापित करतीं हैं। इसके बाद व्रत करने का मन में संकल्प लेती हैं। रात में अखंड दिया जलाकर शिवजी को जल चढ़ाया जाता है। तीनों पहर पार्थिव शिवलिंग की परंपरागत पूजा की जाती है। तीसरे दिन को ऋषि पंचमी कहते हैं। इस दिन पर सप्त ऋषियों की पूजा के बाद पंडित को दान आदि के बाद पति के चरणामृत से व्रत को खोला जाता है और शिव पार्वती से पति की दीर्घायु की कामना की जाती है।