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Tokyo Olympics: कोरोना महामारी के बीच ओलंपिक में भारत की उम्मीद 

पीके मुरलीधरन राजा
Updated Thu, 22 Jul 2021 09:45 AM IST
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टोक्यो विदा हुआ भारतीय दल - फोटो : twitter
इस बार कोरोना महामारी के भय के माहौल में टोक्यो में आगामी 23 जुलाई से खेलों के महाकुंभ यानी ओलंपिक का आयोजन हो रहा है। यूं तो इस ओलंपिक का आयोजन 2020 में ही होना था, लेकिन वैश्विक महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। खैर, अब साल भर की देरी से इसका आयोजन हो भी रहा है, तो कोविड का भय खत्म नहीं हुआ है। खेल तो होंगे, लेकिन स्टेडियम में दर्शक नहीं होंगे। जाहिर है, ऐसे माहौल में न तो खिलाड़ियों में वैसा उत्साह रहेगा और न ही आयोजकों को इसका व्यावसायिक लाभ मिल पाएगा।


एथलीटों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की प्रेरणा तभी मिलती है, जब माहौल उत्साहपूर्ण होता है और स्टेडियम में बैठे दर्शकों से उन्हें शाबाशी मिलती है। इसलिए मुझे लगता है कि इस बार ओलंपिक में बेहतर प्रदर्शन या बेहतर रिकॉर्ड बनना शायद मुश्किल ही होगा। उत्साह और प्रेरणा के अभाव में किसी का प्रदर्शन अच्छा भी हो सकता है और किसी का कमजोर भी। इसलिए रिजल्ट काफी चौंकाने वाले भी हो सकते हैं। मसलन, दूसरे, तीसरे, चौथे रैंक वाले भी पहले स्थान पर आ सकते हैं। 


इसके अलावा, खिलाड़ियों में अपने प्रतिस्पर्धी खिलाड़ियों को लेकर भी कोविड से संबंधित आशंकाएं हो सकती हैं। अगर किसी देश में कोविड महामारी ज्यादा भयावह नहीं रही, तो उस देश के खिलाड़ियों को उन देशों के खिलाड़ियों के साथ स्पर्धा करने में थोड़ा भय और संकोच होगा, जहां कोविड महामारी का असर विनाशकारी रहा है। ऐसे में खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर भी असर पड़ सकता है। सामान्य ओलंपिक में खिलाड़ी सिर्फ अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन इस बार खिलाड़ियों के मन में कोविड संक्रमण का भी भय होगा।


वैसे तो हर देश यह दावा करता है और इच्छा जाहिर करता है कि हमें काफी पदक मिलेंगे, लेकिन जहां तक अपने देश की बात है, तो इस बार हमारे देश से काफी खिलाड़ियों ने ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया है और उनकी तैयारी भी अच्छी है। इसलिए उम्मीद कर सकते हैं कि इस बार भारत की झोली में पहले से कहीं ज्यादा पदक आएंगे। शूटिंग, तीरंदाजी, कुश्ती और बॉक्सिंग में हम कई पदक मिलने की उम्मीद कर रहे हैं। हमारे खिलाड़ियों को अच्छा प्रशिक्षण दिया गया है, पर लॉकडाउन के कारण खिलाड़ियों को कई तरह का नुकसान भी हुआ है।


जिन देशों में कोविड का असर बहुत ज्यादा नहीं रहा, वहां के खिलाड़ियों को तैयारी एवं प्रशिक्षण का काफी मौका मिला होगा, लेकिन हमारे यहां लॉकडाउन के कारण काफी दिनों तक खेल गतिविधियां बंद रहीं, हमारे खिलाड़ी जो विदेश प्रशिक्षण के लिए जाते थे, वे नहीं जा पाए। इन सब कारणों से हमारे खिलाड़ियों को निश्चित रूप से नुकसान हुआ होगा। लेकिन खुशी की बात है कि इस बार हमारे ज्यादा एथलीट क्वालिफाई हुए हैं, उनमें ज्यादातर युवा पीढ़ी के खिलाड़ी हैं। इसलिए 2012 के लंदन ओलंपिक से भी इस बार हमारे देश का बेहतर प्रदर्शन होने की उम्मीद है। जिन एथलीटों से हम पदक लाने की उम्मीद कर रहे हैं, उनमें सौरभ चौधरी, विनेश फोगाट, बजरंग पुनिया, अमित फंगाल, मनु भाकर, दीपिका कुमारी, मीराबाई चानू, मैरीकॉम, पीवी सिंधु और नीरज चोपड़ा आदि शामिल हैं। 


मैंने वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक में अपने देश के दल के एक्टिंग सेफ द मिशन के रूप में प्रतिनिधित्व किया था। उस ओलंपिक में भारत ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था। वहां मैंने देखा था कि हमारे देश के खिलाड़ियों की तुलना में विदेशी खिलाड़ियों को साइंटिफिक सपोर्ट ज्यादा मिलता है। मैं एक उदाहरण देता हूं, जब हम लोग डाइनिंग हॉल में जाते थे, तो हम यह देखते थे कि अमेरिका, ब्रिटेन, चीन आदि के एथलीट जब खाने के लिए जाते थे, तो उनके साथ उनकी एक साइंटिफिक टीम रहती थी, जो यह देखती थी कि किस खिलाड़ी को कितना खाना है, कौन-कौन सी चीजें खानी हैं, किसने कितना कैलोरी खाया, कितना प्रोटीन लिया और जिस सप्लीमेंट की उन्हें जरूरत होती थी, वह उनके डाइट में जोड़ दिया जाता था। 


यानी वे लोग हर चीज की गणना करते हैं, उसी के अनुसार अपने एथलीट को तैयार करते हैं। ऐसे में उनके खिलाड़ियों का बदन तंदुरुस्त रहता है। बस उन्हें अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करना होता है। हालांकि हमारे यहां भी डॉक्टर एवं फिजियोथेरेपिस्ट होते हैं और खिलाड़ियों के भोजन पर ध्यान रखा जाता है, लेकिन हम लोग इतनी बारीकी से निरीक्षण नहीं करते हैं। इसलिए जब दौड़ प्रतिस्पर्धा या थ्रो में अंतिम दौर में बहुत मामूली अंतर (कुछ सेकंडों या उससे भी कम का) होता है, तब इन चीजों से फर्क पड़ता है और इसी से स्वर्ण और रजत पदक का फैसला हो जाता है।
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एक और बात है हमारे देश में, एथलीट अपने बूते या थोड़े सरकारी सहयोग के बल पर पदक लाते हैं। पदक जीतने के बाद उन्हें हर तरफ से प्रोत्साहन और समर्थन मिलता है, लेकिन उससे पहले खिलाड़ियों को जितना समर्थन और प्रोत्साहन चाहिए, उतना नहीं मिल पाता है। यह प्रोत्साहन किसी इवेंट के लिए क्वालिफाई होने के बाद नहीं, बल्कि चार-पांच साल पहले से मिलना चाहिए। हालांकि टॉप्स (टार्गेट ओलंपिक पोडियम स्कीम) जैसी कुछ योजनाएं हैं, जिसके तहत एथलीटों को सरकार की तरफ से वित्तीय मदद मिल पाती है, लेकिन अन्य संगठनों को भी एथलीटों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। जिनको टॉप्स से मदद मिलती है, उनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जरूर है।


एथलीटों की हौसला अफजाई के लिए हरेक देश अपनी तरफ से व्यवस्था करता है और ओलंपिक खेलगांव में भी कोच, मैनेजर, मनोवैज्ञानिक खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाते रहते हैं। यह सब जरूर खिलाड़ियों को मदद करता है, लेकिन एथलीटों का खुद का मनोबल मजबूत बनाए रखने के लिए देश में जो मनोवैज्ञानिक समर्थन चाहिए, उसे शायद और बेहतर बनाने की जरूरत है, क्योंकि अंततः एथलीटों का अपना मनोबल ही काम करता है। मेरा आशय यह नहीं है कि सरकार ऐसा नहीं कर रही है, बल्कि अभी जो खिलाड़ियों को वित्तीय एवं मनोवैज्ञानिक समर्थन मिल रहा है, वह पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन अन्य देशों के मुकाबले उसे और सुधारने की जरूरत है। यही वजह है कि इस बार ज्यादा एथलीट ओलंपिक के लिए क्वालिफाई कर पाए हैं और ज्यादा पदक मिलने की उम्मीद है। 



 
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