लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल अफसरशाही को भारत की सरकारी मशीनरी का 'स्टील फ्रेम' कहते थे। लेकिन आजादी के 73 साल बाद हिंदुस्तान की नौकरशाही दीमक लगा लकड़ी का फ्रेम बन गई है। राजनेताओं और अफसरशाहों में वह नैसर्गिंक संबंध नहीं रह गए, जिसकी कल्पना सरदार पटेल ने की थी। भारत के लोकतंत्र में विपक्ष तकरीबन नदारद है, तो कार्यपालिका के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन ये कंधे इतने कमजोर हो चुके हैं कि भारत में सिविल सेवा का ताजमहल भरभराता जा रहा है। अफसरों की कुछ टोलियां सत्ता में काबिज राजनेताओं के किचन कैबिनेट का हिस्सा बनकर रह गई हैं। न उनका लोक से कुछ लेना-देना है न सेवा से। दुनिया भर के कई सर्वे बता चुके हैं कि भारत की अफसरशाही अपनी ढुलमुल नीतियों, लचर कानून व्यवस्था और अपनी नकारात्मकता के लिए व्यापक रूप से कुख्यात है। नई पीढ़ी में भी ऐसे अफसर आ रहे हैं, जो सोशल मीडिया पर धूमकेतु की तरह छाते हैं और बहुत जल्द भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाते हैं।
भारत को सिविल सेवा का ढांचा अंग्रेजों से विरासत में मिला। भारत छोड़ने से पहले ब्रिटिश हुक्मरानों ने भारत के नेताओं से वचन लिया था कि आजादी के बाद भी इंडियन सिविल सेवा के सारे विशेषाधिकार कायम रहेंगे और तत्कालीन भारत को संविधान में इसकी गारंटी देनी होगी। 1949 में संविधान सभा इस पर जमकर बहस हुई। तब डिप्टी स्पीकर एम.अनन्तशयनम आयंगर ने कहा था कि जब भारत की सरकार अपने देश की गरीब जनता को रोटी, कपड़ा और मकान की गारंटी नहीं दे सकती, तो इन अफसरों को गारंटी कैसे दी जा सकती है? कई सदस्यों का मानना था कि ज्यादातर आईएएस आज यानी आजादी के बाद भी सोचते हैं कि वे देश के मालिक हैं और जनता पर शासन करते रहेंगे। उन्हें अपना व्यवहार और दृष्टिकोण बदलना चाहिए, जिससे जनता यह महसूस करे कि वे उनका दमन करने और उस पर शासन करने के लिए नहीं हैं, बल्कि सेवा व रक्षा करने के लिए हैं।
ये उस जमाने की बात थी, जब मंत्रियों को 750 से 1,000 रुपये तक वेतन मिलता था, जबकि इंडियन सिविल सर्विस के सेक्रेटरी को 2,000 से 3,000 रुपये तक तनख्वाह मिलती थी। संविधान सभा के असम के सदस्य रोहिणी कुमार चौधरी ने तब दिलचस्प चित्र खींचते हुए कहा था-'मंत्री अपनी पुरानी कार को चलाने के लिए सड़क पर धक्का लगाते हैं, क्योंकि वे नई कार लेने की हालत में नहीं होते, जबकि उनके सेक्रेटरी अपनी नई सुंदर मोटर कार में उनके पास से गुजर जाते हैं।' यह विरोध देखकर पटेल ने संविधान सभा में अपने मंत्रियों को सलाह दी- 'अगर आप मंत्री या मुख्यमंत्री हैं, तो आपका यह कर्तव्य हो जाता है कि आप अपने सेक्रेटरी अथवा चीफ सेक्रेटरी को निर्भीक होकर निष्पक्ष रूप से अपनी राय व्यक्त करने की इजाजत दें। पटेल ने कहा -'आज मेरा सचिव एक ऐसी टिप्पणी लिख सकता है, जो मेरे विचारों से मेल न खाती हो। मैंने अपने सभी सचिवों को यह स्वतंत्रता दे रखी है। मैंने उनसे कह रखा है कि अगर आप किसी डर के कारण ईमानदारी से अपनी राय व्यक्त नहीं करते, तो इससे आपके मंत्री को अप्रसन्नता होगी, ऐसी स्थिति में अच्छा यह होगा कि आप चले जाएं। मैं अन्य सचिव को ले जाऊंगा।' यह था एक राजनेता का लोकतांत्रिक नजरिया और अपने अधीनस्थ अफसर को लेकर नैतिक बल। आज यह दृष्टि न किसी नेता में दिखाई देती है, न अफसर में।
दरअसल, आजादी के बाद से ही किसी लोकप्रिय सरकार ने सिविल प्रशासन के ढांचे में सुधार की हिम्मत नहीं दिखाई। हमारे लोकसेवक बदलने को तैयार नहीं और न ही अपने अधिकारों में कोई हस्तक्षेप चाहते हैं। अपने उस ऐतिहासिक भाषण में पटेल ने एक बात और कही थी- 'अगर राजाओं-महाराजाओं को अपना राज्य छोड़ देने के लिए राजी किया जा सकता है, तो सेवाओं के अधिकारियों को इस व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार क्यों नहीं किया जा सकता है।' क्या वह वक्त आ गया है? यह सवाल विचारणीय है।