फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

दक्षिण के दांव-पेच

आर राजगोपालन Published by: Raman Singh Updated Mon, 04 Feb 2019 06:51 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
दक्षिण के राजनेता

दक्षिण भारत की राजनीति देश के अन्य हिस्सों से अलग है। दक्षिण भारत के छह राज्यों-आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और पुड्डुचेरी में लोकसभा की कुल 139 सीटें हैं। तमिलनाडु में लोकसभा की सबसे अधिक 39 सीटें हैं। वहां आठ प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियां हैं। भाजपा एवं कांग्रेस जैसी अखिल भारतीय स्तर की पार्टियों की जड़ें वहां मजबूत नहीं हैं। कर्नाटक में देवगौड़ा की जनता दल (सेक्यूलर) विनाशकारी राजनीति कर रही है। तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद दोनों द्रविड़ पार्टियां नेतृत्वविहीन हैं। 2013 में आंध्र प्रदेश के विभाजन के कारण कांग्रेस वहां अपनी मजबूत पकड़ खो चुकी है।



लोकसभा चुनाव को लेकर अनुमान है कि कर्नाटक में भाजपा को फायदा होगा, तो केरल में कांग्रेस को। तमिलनाडु में द्रमुक का काफी प्रभाव है, जबकि तेलंगाना में टीआरएस का दबदबा है। माकपा को लोकसभा में न्यूनतम सीटें मिलेंगी। दक्षिण भारत की राजनीति अजीब है। इन राज्यों में साक्षरता दर उच्च है। केरल ने सौ फीसदी साक्षरता दर हासिल की है। तमिलनाडु में बेहतर प्रशासन है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के पास सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत है। खैर आइए, अब वास्तविक राजनीति की बात करते हैं।


आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू सत्ता-विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं। उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी जगन रेड्डी और उसकी पार्टी वाईआरएस कांग्रेस ने वहां तेजी से पकड़ बनाई है। राज्य में जाति का वर्चस्व बहुत अधिक है। खम्मा और रेड्डी बारी-बारी से वहां सत्ता पर पकड़ बनाते हैं। वाईएसआर को अगर लोकसभा में ज्यादा सीटें मिलती हैं, तो उसका फायदा निश्चित रूप से भाजपा को होगा। इसका कारण है कि जगन रेड्डी राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस के पूरी तरह से खिलाफ हैं। अगर भाजपा को बहुमत के जादुई अंक तक पहुंचने में थोड़ी मुश्किल आई, तो निश्चित रूप से वाईएसआर कांग्रेस उसे बचा लेगी। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने के कारण नायडू एनडीए से अलग हो गए। कांग्रेस की राज्य इकाई ने तेलुगू देशम के साथ गठजोड़ का विरोध किया था। कांग्रेस और टीडीपी के बीच गठबंधन बेमेल है। एनटी रामाराव की विरासत अब भी राज्य में प्रासंगिक है और कम से कम 10 फीसदी वोट एनटीआर के समर्थकों के हैं।


तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने पिछले ही महीने भारी बहुमत से राज्य विधानसभा का चुनाव जीता है। उन्होंने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया है, इसका कारण यह है कि सत्तारूढ़ टीआरएस विपक्षी विधायकों के टूटकर उसके पाले में आने की उम्मीद कर रही है। टीआरएस को आसानी से चुनाव जीतने का सौभाग्य प्राप्त है, उसे कांग्रेस से कड़े विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। ओवैसी की पार्टी एआईएमएमएस के साथ उसका गठबंधन मजबूत स्थिति में है। टीआरएस की धर्मनिरपेक्ष साख राज्य में उसकी पकड़ का स्वागतयोग्य संकेत है। राज्य विभाजन के लिए जिम्मेदार कांग्रेस ने इस उपलब्धि को वोट में बदलने के लिए अपनी सांगठनिक क्षमता में ज्यादा वृद्धि नहीं की। केसीआर की टीआरएस भी जरूरत पड़ने पर बहुमत जुटाने में भाजपा की मदद कर सकती है।


कर्नाटक में जेडीएस सत्तारूढ़ पार्टी है और इसके मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने दावा किया है कि वह दिहाड़ी मुख्यमंत्री हैं। कांग्रेस और जेडीएस के बीच गठबंधन मजबूत नहीं है। राज्य में कोई प्रशासन नहीं दिखता। राजनीतिक रूप से वहां भाजपा ज्यादा मजबूत है, क्योंकि राज्य में संघ परिवार की पकड़ है। कर्नाटक को दक्षिण भारत का गुजरात कहा जाता है। 2019 के लिए राज्य का चुनावी अनुमान यह है कि यहां भाजपा बेहतर प्रदर्शन करेगी, बीएस येदियुरप्पा की भी राज्य में पार्टी पर मजबूत पकड़ है।

 

जहां तक तमिलनाडु की बात है, तो यहां से 39 सांसद चुने जाते हैं। जयललिता और करुणानिधि के निधन के बाद अब द्रमुक के अध्यक्ष एमके स्टालिन की परीक्षा होगी, क्योंकि उन्होंने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया है, लेकिन अखिलेश यादव और मायावती ने इसका समर्थन नहीं किया है। यहां तीन प्रमुख पार्टियां हैं-अन्नाद्रमुक, एमडीएमके और टीटीवी दिनाकरन की पार्टी। कांग्रेस और भाजपा यहां अप्रासंगिक हैं। सीट जीतने के लिए कांग्रेस यहां द्रमुक पर निर्भर है, जबकि भाजपा को भी अन्नाद्रमुक पर निर्भर रहना पड़ सकता है। केंद्र के समर्थन से राज्य में पलानीस्वामी की सरकार टिकी है। रजनीकांत और कमल हासन का असर लोकसभा चुनाव पर होता नहीं दिख रहा, क्योंकि दोनों विधानसभा चुनाव पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। हालांकि दोनों द्रमुक का वोट काटेंगे और संसदीय चुनाव में अन्नाद्रमुक की मदद करेंगे।

 

केरल में माकपा के पिनरई विजयन मुख्यमंत्री हैं। सबरीमाला विवाद के कारण भाजपा यहां बहुत तेजी से अपनी पैठ बना रही है। ज्यादातर अल्पसंख्यक मतों पर निर्भर कांग्रेस हिंदू वोटों के बीच फंस गई है, जो भाजपा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। निश्चित रूप से भाजपा लोकसभा चुनाव में यहां एक या दो सीटें जीत सकती है। हिंदुत्व की भावना के उभार के कारण भाजपा के वोटों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पुड्डुचेरी दक्षिण का सबसे छोटा राज्य है, जहां कांग्रेस के वी नारायणस्वामी की सरकार है। उनके मुख्य विरोधी एन रंगास्वामी कांग्रेस के विद्रोही नेता हैं। यहां अन्नाद्रमुक और द्रमुक की जड़ें मजबूत हैं, लेकिन इस बात की काफी संभावना है कि यहां कांग्रेस अकेली सीट जीतेगी।
विज्ञापन


दक्षिण भारत की राजनीति उत्तर भारत से बिल्कुल अलग है। दक्षिण भारत में हर ढाई सौ किलोमीटर पर अलग जातियां, कई स्थानीय बोलियां मिलेंगी, पर एक बुनियादी बात यह है कि लगभग सभी राज्य केंद्र सरकार के प्रति नकारात्मक हैं। इसकी वजह हैं क्षेत्रीय क्षत्रप और संघीय व्यवस्था का वर्चस्व। केंद्र में अगली सरकार चाहे नरेंद्र मोदी की बने या महागठबंधन की, इतना तो निश्चित है कि दक्षिण भारतीय राजनेताओं का वर्चस्व रहेगा। 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next