फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

अपनों के ही निशाने पर

क्षमा शर्मा Published by: क्षमा शर्मा Updated Mon, 04 Feb 2019 06:47 PM IST
विज्ञापन
विज्ञापन
क्षमा शर्मा

दस बच्चों की एक मां ने अपने मित्र के साथ मिलकर अपने बेटे को ही मार डाला। महिला का मित्र उसके बेटे का ही दोस्त था। वह इस संबंध का विरोध करता था। इस कारण मां ने ही उसकी जान ले ली। पति ने पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए उसे मार डाला, फिर लाश को टुकड़े-टुकड़े कर जंगल में ले जाकर जला दिया। यही नहीं, पकड़े जाने पर पुलिस को गुमराह करने की कोशिश भी की। दोस्त ने चाय के पैसे न देने पर दोस्त की हत्या कर दी। पत्नी ने बॉयफ्रेंड के साथ मिलकर पति का गला दबा दिया। बेटे और पोती ने मिलकर दादी को मार डाला। बहू ने सास की इतनी पिटाई की कि वह मर गई। दहेज की मांग न पूरी होने पर बहू को जहर दे दिया गया।



इन सभी खबरों में एक बात समान है कि अपने परिवार के लोग ही अपनों को मार रहे हैं। लड़कियों की भ्रूण हत्या के मामले में यह बात लगातार सामने आती रही है। जब भी अपराधों की चर्चा होती है, किसी की हत्या कर दी जाती है, तो हमेशा उंगलियां बाहर वालों पर उठती हैं। पुलिस भी पहले बाहर के लोगों पर ही शक करती है। लेकिन अपनों द्वारा किए गए अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं। समाज इतना कैसे बदल गया है कि नृशंसता भी हद से बाहर हो रही है? विशेषज्ञों की मानें, तो ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि कोई हमें धैर्य रखना नहीं सिखाता। अपने क्रोध और बदले की भावना को कैसे जीता जाए, इसकी जानकारी नहीं दी जाती। इसके अलावा परिवार में अक्सर बातचीत का माहौल नहीं होता। बच्चों और परिवार के अन्य सदस्य एक-दूसरे को सुनें और समझें, इसकी कोशिश परिवार के बड़ों द्वारा नहीं की जाती।

 

किसी से दूरी बनानी हो, तो उससे दूरी के संबंध रखे जा सकते हैं। मगर किसी से दूर हटने का, छुटकारा पाने का आसान तरीका इन दिनों उसकी जान लेना हो गया है। हमारे दिलों में इतना क्रोध कैसे आ गया है कि दूसरे को मारकर ही हमें संतुष्टि मिलती है? यों यह गाना हम हर रोज गाते हैं कि हम उस देश में रहते हैं, जहां का मूल मंत्र अहिंसा है। मनोवैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि युवाओं को एंगर मैनेजमेंट या क्रोध से निपटने की ट्रेनिंग देनी चाहिए, क्योंकि क्रोध जब हम पर हावी हो जाता है, तो वह अच्छे-बुरे की पहचान भुला देता है। इस बात पर भी ध्यान नहीं देने देता कि किसी को मारने के बाद हम भी नहीं बच पाएंगे। दस बच्चों की मां ने जब अपने ही बेटे को मारा, तब उसे अपने बच्चों का खयाल भी भी नहीं आया। अपने बेटे की मौत की सूचना उसने अपनी ही बेटी और दामाद को गलत रूप से दी। लेकिन उन्होंने उसकी बात नहीं मानी और पुलिस को सूचना दे दी। पता नहीं, पश्चाताप की भावना इन अपराधियों के मन में आती है कि नहीं! इसके अलावा यह धारणा भी खत्म होती जा रही है कि औरतें अक्सर इस तरह के अपराधों को अंजाम नहीं देतीं। बल्कि अब तो औरतें भी बढ़-चढ़कर ऐसे मामलों में लिप्त होने लगी हैं। जब भी अपराधी पकड़े जाते हैं, वे रटा-रटाया वाक्य दोहराते हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं किया। या कि अगर दो लोगों ने अपराध किया होता है, तो बचने के लिए वे एक-दूसरे का नाम लगाने लगते हैं कि मेरी तो यह मंशा नहीं थी। और मैंने किसी को नहीं मारा है, उसने मारा है। दिमागों का इतना अपराधीकरण कि परिवार के सदस्य की जान लेने के बाद उसे छिपाने, गलत सूचना देने, किसी और का नाम लगाने में भी अफसोस नहीं होता। आपसी विश्वास का लगातार खत्म होते जाना कितना डरावना है। अपने परिवार पर से ही अगर विश्वास उठने लगे, तो फिर किस पर भरोसा किया जा सकता है!    

विज्ञापन
विज्ञापन
Next