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एक महान गांधी अध्येता का स्मरण, पढ़ें रामचंद्र गुहा का आलेख

रामचंद्र गुहा Published by: रामचंद्र गुहा Updated Sun, 08 Nov 2020 05:54 AM IST
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महात्मा गांधी की मूर्ति - फोटो : iStock

एनुगा श्रीनिवासुलु रेड्डी से पहली बार मैं 1994 में न्यूयॉर्क में मिला था। गोपालकृष्ण गांधी ने मुझे उनके बारे में बताया था और कहा था कि वह एक 'महान गांधी कोश हैं।' अगले पच्चीस बरसों तक मैं उनकी इस पदवी का गवाह बना रहा। इसके कुछ प्रमाण तो बंगलूरू में मेरे डेस्कटॉप कंप्यूटर में ई.एस. रेड्डी मटेरियल, इन्सटॉलमेंट-एक, दो और तीन नामक तीन भारी-भरकम फोल्डरों में संग्रहित हैं। इनमें सैकड़ों फाइलें हैं, जो मुझे पिछले वर्षों में गोपाल गांधी के दोस्त (और अब मेरे भी) ने तोहफे के रूप में ईमेल अटैचमेंट या कुरियर से भेजी गई सीडी के रूप में दी हैं। उन्होंने उदारता के साथ जो सामग्री मुझसे साझा की है, उनमें आधा दर्जन भाषाओं में अखबारों तथा पत्रिकाओं में छपे आलेख, तीन देशों के गांधी के सहयोगियों की प्रोफाइल, उनकी मौत के बाद प्रकाशित आलोचनात्मक टिप्पणियां इत्यादि शामिल हैं।



विश्व के महान गांधी अध्येता बनने से पहले ई एस रेड्डी ने एक अन्य क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि हासिल कर ली थी। वह 1924 में पैदा हुए थे और एक दक्षिण भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों के परिवार में पले-बढ़े। उन्होंने अपनी पेशेवर जिंदगी न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में काम करते हुए बिताई, जिसका काफी हिस्सा संयुक्त राष्ट्र के अस्पृश्यता के विरुद्ध काम करने वाले केंद्र में बीता था। इस हैसियत से काम करते हुए रेड्डी ने संभवतः दक्षिण अफ्रीका से बाहर किसी की भी तुलना में उस देश की नस्लवादी सत्ता के विरुद्ध और अंततः उसका खात्मा करने के लिए काम किया था। उम्र के छठे दशक में, अपने रिटायरमेंट के बाद ही वह खुद को स्कॉलरशिप के लिए समर्पित कर पाए। उन्होंने गांधी, उनके प्रभाव और उनकी विरासत पर एक दर्जन से अधिक किताबों का लेखन या संपादन किया; दो अन्य किताबें जो उन्होंने पूरी की थीं वे प्रकाशित होने की प्रक्रिया में हैं। लेकिन इस क्षेत्र या दूसरे क्षेत्रों के अध्येताओं के विपरीत रेड्डी में अपनी चीजों को लेकर स्वामित्व का भाव नहीं था; उनके पास जो भी सामग्री थी, जो भी चाहे उसके लिए भी उपलब्ध थी। अध्येताओं को मदद करने के साथ ही उन्होंने हजारों दुर्लभ दस्तावेज नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी तथा येल यूनिवर्सिटी को दान में दे दिए। यह रेड्डी ही थे, जिन्होंने अहमदाबाद स्थित साबरमती आश्रम को उसका पहला कंप्यूटर दान दिया, जिसके जरिये गांधी के पत्रों के कीमती संग्रह का डिजिटाइजेशन किया गया।


इसी हफ्ते की शुरुआत में ई एस रेड्डी के निधन के बाद मैंने फाइनेंशियल एक्सप्रेस में उन पर एक स्मृति लेख लिखा था, जिसमें मैंने उनके जीवन और काम से जुड़े अहम पहलुओं पर चर्चा की थी। इस आलेख में मैं व्यक्तिगत तौर पर उन्हें याद कर रहा हूं कि मेरे और मेरे जैसे अन्य गांधी अध्येताओं के लिए वह क्या मायने रखते हैं। आरंभिक अध्ययन सामग्री भेजने के अलावा रेड्डी ने मुझे कुछ किताबों के बारे में भी सलाह दी थी। उदाहरण के लिए, उन्होंने मुझे दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रहों से संबंधित दो दुर्लभ प्रत्यक्षदर्शी संस्मरण पढ़ने की सलाह दी, जिन्हें भवानी दयाल और राओजीभाई पटेल ने लिखा था। जब मैं गांधी की जीवनी पर काम कर रहा था, तब रेड्डी ने रेखांकित किया कि किन विषयों पर सावधानी से ध्यान दिए जाने की जरूरत है। एक मेल में उन्होंने मुझे लिखा, 'आपको एक अध्याय गांधी और यहूदी पर समर्पित करना होगा... गांधी से परिचित पश्चिम के अध्येता लुई फिशर की किताब में दर्ज एक उद्धरण, 'जर्मनी के यहूदियों को सामूहिक आत्महत्या कर लेनी चाहिए, के कारण इस विषय को हाथ नहीं लगाना चाहते।' उन्होंने आगे लिखा, 'मैं इस विषय पर मेरे द्वारा संग्रहीत सामग्री संलग्न कर रहा हूं। इसमें मार्टिन बुबेर के साथ ही हिब्रू यूनिवर्सिटी के सम्मानित प्रमुख जूडा एल मैग्नस की गांधी को लिखी चिट्ठियों को प्रतियां थीं और ये दोनों अरबों के साथ मित्रता चाहते थे।'


प्रवासी भारतीयों के उनके खुद के संघर्ष पर केंद्रित गांधी के संस्मरण का नाम था सत्याग्रह इन साउथ अफ्रीका। रेड्डी ने मुझसे आग्रह किया था कि गांधी ने जो खुद लिखा था, मुझे उससे आगे जाकर देखना चाहिए। दो अक्तूबर, 2009 को, महात्मा की 140वीं जयंती के दिन भेजे गए एक पत्र में उन्होंने टिप्पणी की : 'मुझे लगता है कि गांधी ने सत्याग्रह के लिए तमिलों को पर्याप्त श्रेय नहीं दिया और गुजरातियों-कसालिया, रुस्तमज, अदजानिया इत्यादि-की कहीं अधिक प्रशंसा की। संभवतः ऐसा इसलिए था, क्योंकि उनका सामाजिक जीवन गुजरातियों के बीच बीत रहा था। लेकिन यह तमिल ही थे, जब गुजराती व्यापारी अलग हो गए, तो उन्होंने थंबी नायडू के नेतृत्व में सत्याग्रह को जीवित रखा।' रेड्डी ने मुझे यह भी याद दिलाया था कि गांधी के सामाजिक दृष्टिकोण का विस्तार प्रवासी भारतीयों के बीच हुआ था। जैसा कि उन्होंने लिखा, 'दक्षिण अफ्रीका के अपने अनुभव के कारण ही वह किसानों, कामगारों और महिलाओं को जोड़ सके। तकलीफों के बावजूद अनेक व्यापारी सत्याग्रह से अलग हो गए। '


ई एस रेड्डी के पास गांधी के जीवन और उनके अभियानों से जुड़ी बारीक जानकारियां थीं और उन्होंने उदारता और उत्सुकता के साथ इसे दुनिया भर के अध्येताओं को दिया। इसके साथ ही गांधी के गुणों और उनके व्यक्तित्व के बारे में भी उनकी गहरी समझ थी। इसका प्रमाण मिला जून, 2011 में एक अखबार के लिए लिखे मेरे कॉलम के बाद जिसमें मैंने यह बताया था कि हमारे समय के प्रचार को आतुर साधु-संत गांधी से कितने उलट हैं। मैंने विशेष रूप से बाबा रामदेव का उल्लेख किया था, जिन्होंने थोड़े दिन पहले ही नई दिल्ली में भ्रष्टाचार के विरुद्ध आमरण अनशन किया था, लेकिन पुलिस के आने के बाद वह वहां से भाग गए थे।


मैंने अपने कॉलम में गांधी के बारे में लिखा था कि 'वह एक ऐसे राजनेता और समाज सुधारक थे, जिनके लिए नैतिक और अध्यात्मिक जीवन बराबरी से महत्वपूर्ण थे'। हालांकि मैंने यह भी लिखा कि उनके राजनीतिक कर्मों के विपरीत उनके नैतिक कर्म सार्वजनिक न होकर उनके अपने आश्रम में निजी तौर पर केंद्रित रहे। गांधी के लिए एकांत और अध्यात्म एक दूसरे से जुड़े रहे। इसीलिए अपने आंदोलनों के दौरान उन्होंने साबरमती या सेवाग्राम में महीनों सोचने, खोज करने और कताई करने में व्यतीत किए। मैंने लिखा, 'दूसरी ओर हमारे समकालीन गुरु खुद के साथ एक दिन भी नहीं बिताते। पुलिस ने जब रामदेव को दिल्ली से बाहर भेजा, तब रामदेव ने कहा कि वह हरिद्वार में अपने आश्रम में सत्याग्रह करेंगे। लेकिन महज 24 घंटे के भीतर ही उन्होंने मीडिया के अपने शुभचिंतकों के करीब जाने के लिए हरिद्वार छोड़ दिया। दिल्ली से बाहर भेजे जाने के बाद रामदेव जानते थे कि अनेक टीवी चैनलों के मुख्यालय नोएडा में हैं।'


इस कॉलम को पढ़ने के बाद रेड्डी ने मुझे एक लंबी टिप्पणी भेजी। उन्होंने मेरी राय को खारिज नहीं किया कि रामदेव जैसे लोगों को अध्यात्मिकता से जुड़े इतिहास में नहीं, बल्कि प्रचार से जुड़े इतिहास में दर्ज किया जाएगा। लेकिन उन्होंने यह भी लिखा, गांधी के बारे में आपने जो कहा, उसे लेकर मुझे परेशानी है।' रामदेव के विपरीत गांधी ने न तो फोटोग्राफ के लिए पोज दिए और न ही खबरों में रहने की कोशिश की। रेड्डी ने गौर किया कि गांधी इसके बावजूद लोगों से संवाद करने को उत्सुक रहते थे। अपनी यात्राओं और साप्ताहिक कार्यक्रम में वह लोगों से संवाद करते थे। उन्होंने भारतीय और विदेशी प्रेस को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े राजनीतिक मसलों पर इंटरव्यू दिए। वह खुद के लिए प्रचार नहीं चाहते थे, जैसा कि उन्हें सम्मान, कार्यालय, सत्ता या धन की लालसा भी नहीं थी, लेकिन वह चाहते थे कि जिन चीजों को लेकर वह लड़ रहे हैं, उन्हें प्रचार मिले। इससे दोनों को प्रचार मिलता था।
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रेड्डी ने मेल में आगे लिखा, 'गांधी एकांत में साधना करते थे। लेकिन उनका धर्म निजी नहीं था। उनकी प्रार्थना सभाएं सार्वजनिक होती थीं। उनकी आध्यात्मिकता का राजनीति से जुड़ना जरूरी था ताकि अन्याय को दूर करने की कोशिश की जा सके। उन्होंने खुद को महर्षि अरविंद की तरह खुद को आश्रम में सीमित नहीं किया। लेकिन उन्होंने लोगों से यह भी नहीं कहा कि वे उनकी आध्यात्मिकता के कारण उनका अनुसरण करें। उन्होंने कभी भगवा नहीं पहना, बल्कि गरीब किसान के पहनावे को अपनाया। उन्होंने महात्मा की उपाधि को खारिज किया, क्योंकि वह इसके पतन से वाकिफ थे।'


मैं जिन्हें जानता हूं, उनमें ई एस रेड्डी एक महान व्यक्ति थे। उनकी विरासत दक्षिण अफ्रीका, भारत और पूरे विश्व में ऐसे अनगिनत लोगों के काम के रूप में जीवित रहेगी जिन्हें उन्होंने प्रोत्साहित और प्रेरित किया।

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